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मगध की लड़ाई-2:औरंगाबाद-नवादा-अरवल में कई चेहरों-जातियों की प्रतिष्ठा दांव पर; एंटी इनकम्बेंसी और भितरघात भी प्रत्याशियों को परेशान कर रहा

पटना3 महीने पहलेलेखक: शालिनी सिंह
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मगध प्रमंडल के पांच जिलों गया, जहानाबाद, अरवल, नवादा और औरंगाबाद की लड़ाई बहुत रोचक है। - Dainik Bhaskar
मगध प्रमंडल के पांच जिलों गया, जहानाबाद, अरवल, नवादा और औरंगाबाद की लड़ाई बहुत रोचक है।
  • औरंगाबाद, नवादा और अरवल की 13 विधानसभाओं का चुनावी गणित
  • कई सीटों पर जातियों और चेहरों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है

मगध प्रमंडल के विधानसभा क्षेत्रों में इस बार मुकाबला काफी रोचक है। बदले समीकरण के बीच उम्मीदवार चुनावी मैदान में एक-दूसरे को टक्कर दे रहे हैं। कहीं साथ तो कहीं भितरघात, कहीं एंटी इनकंबेंसी फैक्टर तो कहीं जातीय गुणा-गणित से प्रत्याशियों की चिंता बढ़ गई है।

मगध प्रमंडल के जिले- गया, जहानाबाद, अरवल, नवादा, औरंगाबाद

बदला समीकरण

  • 2010 में राजद, जदयू थी साथ में, कांग्रेस अकेले और राजद और लोजपा थी साथ
  • 2015 में जदयू,कांग्रेस और राजद थी साथ, भाजपा के साथ लोजपा और हम थी
  • 2020 में भाजपा और जदयू हैं साथ, लोजपा अकेले और कांग्रेस, राजद है साथ

मगध प्रमंडल की कुल 26 सीटों पर पार्टियों का हाल

  • राजद 2015 में जीती कुल 10 सीटें
  • जदयू 2015 में जीती थी 6 सीटें
  • कांग्रेस 2015 में जीती थी 4 सीटें
  • भाजपा को 2015 में यहां मिली थीं-5 सीटें
  • हम को 2015 में यहां मिली थी 1 सीट

मगध प्रमंडल की 26 सीटों पर पार्टियों का हाल

  • राजद को 2010 में मिली-1 सीट- बेलागंज (गया) बाकी जिलों में 0 पर आउट
  • कांग्रेस को 2010 में 0 पर होना पड़ा था आउट
  • जदयू को 2010 में 16 सीटें मिली थीं
  • भाजपा को 08 सीटें मिली थीं
  • अन्य को 01 सीट मिली थी

रिजर्व सीटें- 6 सीटें

इस रिपोर्ट के पहले पार्ट में हमने गया और जहानाबाद जिलों के कुल 13 विधानसभा सीटों का हाल बताया था। अब इस दूसरे पार्ट में औरंगाबाद, नवादा और अरवल जिलों की 13 विधानसभाओं का हाल पढ़िए :

मगध की लड़ाई - 1: गया-जहानाबाद में कहीं भितरघात तो कहीं एंटी इंकम्बेंसी बनेगा फैक्टर, मांझी के लिए है प्रतिष्ठा का सवाल

औरंगाबाद

  • भाजपा से रामाधार सिंह
  • कांग्रेस से आनंद शंकर सिंह
  • कांग्रेस को भाजपा देगी टक्कर

औरंगाबाद विधानसभा में राजपूत वोटरों का रुख जीत और हार तय करने की हैसियत रखता है। यही वजह है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने यहां से इसी जाति के उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, लेकिन भाजपा के रामाधार सिंह के लिए अपने ही सांसद सुशील सिंह के साथ उनकी अनबन उन्हें परेशान करती रही है। कांग्रेस के प्रत्याशी आनंद शंकर यहां से मौजूदा विधायक भी हैं, जिन्होंने पिछली बार 18 हजार से अधिक वोटों से रामाधार सिंह को हराया था। रामाधार सिंह के हारने का सबसे बड़ा कारण उनका एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर माना गया था, लेकिन इसबार आनंद शंकर को भी अपने 5 साल का काम दिखाना होगा।

ओबरा

  • जदयू से सुनील कुमार
  • राजद से ऋषी कुमार
  • लोजपा से डॉ प्रकाश चंद
  • राजद अपनी सीट बरकरार रखने के लिए जदयू को कांटे की टक्कर देगा

ओबरा सीट पर सीधे-सीधे दो यादवों की लड़ाई है, लेकिन 40 हजार भूमिहार, 30 हजार वैश्य और 5 हजार दलित वोट यहां निर्णायक भूमिका निभाएंगे। जदयू के लिए यहां चुनौती 30 हजार वैश्य वोट को अपने खाते में लाना है, क्योंकि इस वोट पर लोजपा की भी नजर है।

रफीगंज

  • जदयू से अशोक कुमार सिंह
  • राजद से मो. नेहालुद्दीन
  • लोजपा से मनोज कुमार सिंह
  • जदयू-राजद में कड़ी टक्कर

राजद से रफीगंज के मैदान में उतरे मो. नेहालुद्दीन 2010 में भी अशोक कुमार सिंह के सामने उतरे थे। हालांकि उन्हें 23 हजार मतों से हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यहां जदयू के अशोक कुमार सिंह की राह आसान होगी, क्योंकि 2015 के चुनाव में यहां लोजपा के टिकट पर उतरे और अभी निर्दलीय लड़ रहे प्रमोद कुमार सिंह भी हैं। प्रमोद कुमार सिंह तब 9 हजार वोटों से हारे थे। लोजपा एकबार फिर यहां चुनौती दे रही है। लोजपा की तरफ से मनोज कुमार सिंह मैदान में हैं। ऐसे में यहां अशोक कुमार सिंह के लिए जीत की राह आसान तो नहीं होगी।

नवीनगर

  • जदयू से वीरेंद्र कुमार सिंह
  • राजद से विजय कुमार सिंह
  • लोजपा से विजय कुमार सिंह

नवीनगर सीट की लड़ाई को 2010 के नतीजों से देखें तो यहां का त्रिकोण साफ दिखता है। इस सीट पर पिछली बार जदयू के वीरेन्द्र कुमार को लगभग 32 फीसदी वोट मिले थे। भाजपा यहां तब दूसरे नंबर पर थी, लेकिन 2010 में लोजपा के विजय कुमार सिंह, वीरेन्द्र कुमार सिंह के खिलाफ मैदान में उतरे थे। हालांकि जीत वीरेन्द्र कुमार सिंह को ही मिली, लेकिन दोनों के वोट का अंतर केवल 8 फीसदी था। इसलिए इसबार यह लड़ाई त्रिकोणीय हो चली है।

गोह

  • भाजपा- मनोज शर्मा
  • राजद- भीम कुमार सिंह
  • रालोसपा- रणविजय सिंह
  • भाजपा और राजद में है सीधा मुकाबला

रालोसपा यहां इस बार मुकाबला त्रिकोणीय बना रही है। गोह सीट पर रालोसपा और भाजपा के प्रत्याशियों का एक ही जाति से होने से राजद को इसमें जीत का फैक्टर दिखाई दे रहा है। पिछली बार यहां से जीते मनोज शर्मा की जीत का सबसे बड़ा कारण सवर्ण वोट का उनके खाते में जाना माना जाता रहा है, लेकिन इसबार यहां जीत उसकी होगी, जो अतिपिछड़ा वोटरों को अपने साथ ला पायेगा। कुशवाहा वोट अगर पूरी तरह से रालोसपा के खाते में गया तो मनोज शर्मा के लिए जीत मुश्किल होगी। पिछली बार यहां जीत और हार का अंतर 7673 वोटों का था, जो करीब 5 फीसदी है।

कुटुम्बा (सु)

  • हम- श्रवण भुइयां
  • कांग्रेस- राजेश कुमार
  • लोजपा- सरूण पासवान
  • ललन राम भी इस बार निर्दलीय प्रत्याशी

कुटुम्बा की लड़ाई दिखती तो बहुत आसान है, लेकिन वास्तव में बेहद उलझी है। यहां कांग्रेस के राजेश कुमार मौजूदा विधायक हैं, लेकिन उनका अपने क्षेत्र में प्रभावी तरीके से काम नहीं करा पाना उनकी सबसे बड़ी नाकामी मानी जा रही है। दूसरी तरफ एनडीए प्रत्याशी श्रवण भूइंया हैं, जिन्हें हम ने टिकट दिया है। श्रवण भूंइया का नया होना उन्हें कुछ फायदा तो कुछ नुकसान दिलाता दिख रहा है। क्षेत्र के लोगों ने एनडीए के साथ नये चेहरे पर भरोसा किया तो उन्हें फायदा मिल सकता है, लेकिन अगर लोजपा के सरूण पासवान भाजपा को अपना साथी दिखाने में कामयाब रहे तो उनकी मुश्किल बढ़ सकती है। वहीं जदयू में कभी रहे निर्दलीय ललन राम भी एनडीए का वोट अपना खाते में लायेंगे, जिससे आखिरकार मुश्किल श्रवण भूइंया की ही बढ़ेगी।

नवादा

  • जदयू से कौशल यादव
  • राजद से विभा देवी
  • लोजपा से शशिभूषण कुमार

नवादा की राजनीति कौशल यादव और राजवल्लभ यादव, दो बड़े राजनीतिक नामों के बीच ही घूमती रही है, लेकिन राजवल्लभ यादव फिलहाल रेप के आरोप में जेल में हैं। लिहाजा राजद ने उनकी पत्नी विभा देवी को मैदान में उतारा है। कौशल यादव और राजवल्लभ यादव के प्रभाव के बावजूद 2019 के उपचुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी श्रवण यहां दूसरे स्थान पर रहे थे और उनकी वजह से 2020 का चुनाव भी यहां त्रिकोणीय हो चुका है। नवादा में इस बार 15 प्रत्याशी मैदान में हैं।

रजौली (सु)

  • भाजपा- कन्हैया कुमार
  • राजद- प्रकाश वीर
  • राजद इस सीट को अपने पास रखने के लिए भाजपा को टक्कर देगी

रजौली सुरक्षित सीट है, पर राजनीतिक लड़ाई यहां हमेशा दिलचस्प होती है, क्योंकि यह इलाका झारखंड से जुड़ा है और नक्सलग्रस्त भी है। लिहाजा, यहां की राजनीति पर झारखंड की राजनीतिक गतिविधियों का असर दिखता रहता है। इस बार रजौली में 22 प्रत्याशी मैदान में उतरे हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला राजद के प्रकाश वीर व भाजपा के कन्हैया कुमार के बीच ही है। मुसीबत यह है कि राजद से बागी बनकर प्रेमा चौधरी चुनाव लड़ रही हैं और भाजपा से बागी होकर अर्जुन राम मैदान में हैं।

हिसुआ

  • भाजपा से अनिल सिंह
  • कांग्रेस से नीतू कुमारी
  • भाजपा को कांग्रेस देगी टक्कर

हिसुआ से पिछले 15 साल से अनिल सिंह चुनाव जीतते रहे हैं। भाजपा ने एक बार फिर अनिल सिंह पर भरोसा जताया है, जबकि कांग्रेस ने 27 साल तक यहां विधायक रहे आदित्य सिंह की बड़ी बहू नीतू सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है। इस सीट पर भितरघात अनिल सिंह को परेशान कर सकता है। इस सीट से इसबार सबसे कम 8 प्रत्याशी मैदान में हैं।

गोविंदपुर

  • जदयू से पूर्णिमा यादव
  • राजद से मो. कामरान
  • लोजपा से रंजीत यादव
  • जदयू और राजद में होगी टक्कर

गोविंदपुर से राजद ने मो. कामरान को मैदान में उतारा है। जदयू से कांग्रेस की मौजूदा विधायक पूर्णिमा यादव मैदान में है। पूर्णिया यादव के लिए ये सीट पुश्तैनी रही है। इसके साथ ही भाजपा से बागी रंजीत यादव लोजपा के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि, गोविंदपुर की लड़ाई राजद,जदयू की सीधी लड़ाई है।

वारसलीगंज

  • भाजपा से अरुणा देवी
  • कांग्रेस से सतीश कुमार
  • भाजपा को कांग्रेस देगी टक्कर

वारसलीगंज सीट से दो बाहुबली की पत्नियां मैदान में हैं। भाजपा से अखिलेश सिंह की पत्नी अरुणा देवी हैं तो अशोक महतो के भतीजे की पत्नी आरती देवी निर्दलीय मैदान में है। मुकाबला यहां दिलचस्प होगा, क्योंकि मौजूदा विधायक अरुणा देवी यहां से तीन बार चुनी जा चुकी हैं। महागठबंधन की ओर से यहां सतीश कुमार सिंह भी मैदान में हैं। रालोसपा ने यहां राजेन्द्र प्रसाद को मैदान में उतारा है। इसके साथ ही 10 और प्रत्याशी यहां मैदान में हैं, लेकिन यहां लड़ाई त्रिकोणीय है, जो भाजपा, कांग्रेस और आरती देवी निर्दलीय के बीच दिख रही है।

अरवल

  • भाजपा- दिलीप कुमार शर्मा
  • सीपीआईएमएल- महानंद सिंह
  • दोनों पार्टियों के बीच कड़ी टक्कर है

अरवल में इस बार पूरा मैदान बदल चुका है। 2015 में यहां राजद के प्रत्याशी लगभग 43 फीसदी वोट लेकर जीते थे, लेकिन इसबार वे मैदान में नहीं हैं, क्योंकि यहां इसबार सीपीआईएमएल के महानंद सिंह महागठबंधन के प्रत्याशी बने हैं। इसी तरह भाजपा ने अरवल से 2010 में चुनाव जीते चितरंजन की जगह इसबार दिलीप कुमार शर्मा मौका दिया है। दोनों नये चेहरों के साथ यहां लड़ाई कड़ी हो चली है।

कुर्था

  • जदयू से सत्यदेव सिंह कुशवाहा
  • राजद से बागी कुमार वर्मा
  • लोजपा से भुवनेश्वर पाठक
  • जदयू को राजद देगी टक्कर

कुर्था में कोईरी जाति सीधी टक्कर में होती है। यह टक्कर यादव और भूमिहार जाति से होती है। यही वजह है कि जदयू ने इस बार भी बीते दो चुनाव से यहां जीत रहे सत्यदेव सिंह कुशवाहा पर ही भरोसा किया है तो दूसरी तरफ राजद ने बागी कुमार वर्मा को मैदान में उतारा है। लोजपा यहां फरवरी 2005 में जीती थी। उसके बाद अक्टूबर 2005 के चुनाव में उसे यहां 14 फीसदी वोट मिले थे। अब लंबे समय बाद फिर वे मैदान में हैं, लेकिन उसका असर कितना पड़ेगा, यह देखना होगा।

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