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चुनावी बतकही:इहां, कुछु क्लियर नहीं है, समझे में नहीं आ रहा है कि ई बेर कौन बाजी मारेगा; वोटर सब की तो बात छोड़िए, नेतवन भी सब कंफ्यूज है

पटनाएक महीने पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र
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शाम के 4-5 बजे का वक्त है। डुमरांव राजगढ़ के सामने चहल-पहल कुछ ज्यादा है। थोड़ी ही देर पहले चमचमाती कारों के साथ नेता जी अपने पिछलग्गुओं को लेकर प्रचार के लिए निकले हैं। सामने 7-8 लोगों की एक चौपाल लगी है। पिछली बार यहां से चुनाव हारे एक नेता जी (रामबिहारी सिंह) भी बैठे हैं। इस बार इनको किसी पार्टी से टिकट नहीं मिला है। जदयू से रालोसपा और फिर रालोसपा से जदयू का चक्कर काट चुके हैं।

मेरे साथ ही खड़ा एक युवक धीरे से कहता है, ‘ई कई बार चुनाव लड़े लेकिन का बताएं, इनके नसीब में विधायक बनना था ही नहीं। अब तो संन्यासे समझिए।’

न तो नेता जी मास्क पहने हैं, न इनके साथ बैठे लोग। कोरोना का तो जैसे इनपे कोई असर ही नहीं है। नेताजी जी कह रहे हैं, ‘ई बेर माहौल जदयू के साथ है। आप लोग जोर लगाइए। वोट कटवन से सावधान रहना है।’

हमने पूछा कि ‘टिकट कटवन’ के बारे में आपका क्या ख्याल है, आप लोगों ने तो अपने सिटिंग एमएलए का ही टिकट काट के ऐसे उम्मीदवार को दे दिया, जिसके बारे में लोग जानते भी नहीं हैं। कहते हैं- ‘सब देखते जाइए, कोई टक्कर में नहीं है।’

यहां से आगे बढ़े तो कुछ और युवा मिले। इनमें से एक भाजपा से जुड़ा है और वार्ड पार्षद भी है। हमने डुमरांव के माहौल के बारे में पूछा तो कहता हैं, ‘कुछु क्लियर नहीं है। समझे में नहीं आ रहा है कि ई बेर कौन बाजी मारेगा। वोटर सब की तो बात छोड़िए, नेतवन भी सब कंफ्यूज है।’

दरअसल, जदयू ने सिटिंग एमएलए ददन यादव का टिकट काटकर अंजुम आरा को दिया तो ददन निर्दलीय ही उतर गए हैं। उधर, राजद और रालोसपा तो हैं ही। सबसे दिलचस्प ई है कि अबकी बार डुमरांव राजघराने से पहली बार कोई विधानसभा का चुनाव लड़ रहा है। नाम है शिवांग विजय। निर्दलीय ही मैदान में उतरे हैं। इनके दादा महाराजा कमल सिंह बक्सर से दो बार लगातार सांसद रहे थे। इसी साल जनवरी में उनकी मौत हो गई। इलाके में बहस के कई सिरे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा जदयू-भाजपा-रालोसपा-राजद के गुणा-गणित की है।

भाजपा से जुड़े लोग ही कह रहे हैं कि- अबकी जदयू को ठिकाने लगाना है। अभी थोड़ा माहौल बनने दीजिए न, फिर तय होगा कि महाराज को वोट देना है कि लोजपा को। इहे दुनों में से कोई एक को हमलोग वोट करेंगे, जदयू का त खेले खल्लास है।

बगल में ही लिट्टी की दुकान पर थोड़ी भीड़ तो दिख रही है, लेकिन माहौल पूरी तरह शांत है। कोई पॉलिटिकल डिबेट नहीं हो रही है। ऐसा पहली बार ही दिख रहा है कि चुनाव से चंद दिन पहले भी लोगों के बीच इस कदर खामोशी छाई हुई है। मेरे साथ ही एक स्थानीय पत्रकार भी लिट्टी खा रहे हैं। उनसे पूछा कि इस खामोशी की वजह कोरोना तो नहीं? बोले, 'कोरोना का तो कोई असर नहीं हैं, यहां के लोगों पर। देखिए न, कोई आपको मास्क पहने हुए दिख रहा है? आप मास्क पहने हैं तो कुछ दिन बाद लोग आपका ही मजाक उड़ाने लगेंगे!

देखिए भीतरखाने की बात तो ई है कि ‘अबकी खाली डुमरांव में ही नहीं पूरे बिहार में भाजपा खेल करने वाली है और ई बात नीतीश भी अच्छे से समझ रहे हैं’। यह सब सुनते बगल वाले सज्जन से रहा नहीं गया। बोले- ‘नीतीशो को हल्के में मत लीजिए। कल को भाजपा से बात नहीं बनी तो उनको फिर पलटी मारकर राजद में जाने में कोई फेर नहीं है’। उनका राजनीतिक विश्लेषण यहीं पूरा नहीं हुआ है। बोले- ‘...लेकिन अभी दोनों दल फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे हैं। परिणाम जो भी हो, लेकिन एक चीज तो साफ दिख रहा है कि नीतीश को ई बेर सबसे ज्यादा नुकसान होगा। अब इसका फायदा लोजपा को होता है कि राजद को आगे की सारी राजनीति और सरकार का बनना-बिगड़ना इसी बात पर निर्भर रहने वाला है।

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