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बुजुर्गों के सुमिरन बिना नहीं सजती फगुआ मंडली लाेक संस्कृति के संरक्षण में इनका बड़ा योगदान

एक वर्ष पहले
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भोजपुरिया इलाके में फगुआ (होली) की एक अलग पहचान व शैली रही है। द्विअर्थी गीतों के बढ़ते प्रचलन के बावजूद आज भी भोजपुरिया सांस्कृतिक विरासत की पारंपरिक शालीन गायन परंपरा कायम है। इसके संरक्षण, संवर्धन व नयी पीढ़ी के दिलों में पहुंचाने में हमारे बुजुर्गाे का बड़ा योगदान है। जिनके बिना सत्यनारायण भगवान की पूजा से लेकर रामायण, चइत, कीर्तन का सुमिरन तक नहीं होता।..और गांवों में फगुआ की महफिलों को इनके आने का इंतजार रहता है। नाम- शिव शंकर सिंह। उम्र-95 साल। इलाके में पाड़े बाबा के नाम से मशहूर। धार्मिक प्रवृत्ति, कई दशकों से रामायण, फगुआ, चइत व कीर्तन मंडलियों में गायन के कारण पाड़े बाबा नाम पड़ा। ये बड़हरा प्रखंड के पड़रिया गांव निवासी है।बचपन से ही परंपरागत लोक परंपरा के गायन करते हैं। कभी भी द्विअर्थी गाना नहीं गाते। मजाक में भी कोई कह दें, तो ढोलक-हारमोनियम बजाना व गाना छोड़कर भरी महफिल से उठकर चल देते हैं। बिना लाउडस्पीकर के भी इनके सुमिरन की आवाज दूर तक गंूजती थी। लेकिन रामायण, फगुआ और चइत की महफिलों में आज भी जाते हैं। हालांकि, अब बढ़ती उम्र के कारण कम हो गया है। पांच साल पहले पहले तक जिला-जवार के साथ-साथ दूसरे जिलों व यूपी तक कीर्तन या रामायण-चइत मुकाबलों में जाते थे। इन्होंनेे अपने पिता यदुनंदन सिंह से रामायण गाना सीखा था।

जिलों व यूपी तक कीर्तन या रामायण-चइत मुकाबलों में जाते थे। इन्होंनेे अपने पिता यदुनंदन सिंह से रामायण गाना सीखा था।

नाल बजाते रामदरश राय।
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