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दुःख हमेशा धैर्य, मित्र, स्त्री और धन की परीक्षा लेने के लिए आती है : असंग देव

एक वर्ष पहले
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चिंता करने से मनुष्य का शरीर बलहीन हो जाता है और विवेक खो जाता है। जिस प्रकार लकड़ी के महल को दीमक जब अंदर ही अंदर खोखला कर देता है तो महल एक दिन ढह जाती है उसी प्रकार शरीर रूपी महल में चिंता की दीमक लग गई तो ये शरीर भी ढह जायेगी। इसलिए मनुष्य को हंसते हंसते जीना खीखना चाहिए।

यह बातें प्रखंड क्षेत्र के अटपहरा गांव में आयोजित सुखद सतसंग के आखरी दिन शुक्रवार को राष्ट्रीय संत असंग देव जी महाराज ने अपने श्रद्धालुआें से प्रवचन में कही। महाराज ने कहा जीवन प्रबंधन और जीवन जीने के कला कबीर के दोहे चैपाइयों में छिपी है जरूरत है तो उसे श्रवण कर जीवन में उतारने की। धर्म, पंथ और मान्यताएं भले ही अलग हो सकती हैं, लेकिन कबीर ने सभी के लिए लिखा है। उन्होंने कहा मनुष्य योनी सबसे महत्वपूर्ण है। उसके जैसा समझदार और सुलझा हुआ प्राणी कोई नहीं है, लेकिन सांसारिक जीवन में प्राणी इसमें उलझ जाता है और खुद की आवश्यकताओं और जरूरतों को पूरा करने में ही दिन भर भटकता है। इसी कारण वर्तमान में आध्यात्म से वह दूर हो रहा है।

दुःख आना मनुष्य के हाथ में नही लेकिन दुःख में दुखी ना होना ये मनुष्य के हाथ में है। क्योंकि दुःख सदा रहने के लिए नही आता। दुःख हमेशा आपत्ति के समय धैर्य, मित्र, स्त्री और धन की परीक्षा लेने के लिए आती है। महाराज ने कहा भाई की सेवा करना सीखना है तो लक्ष्मण से सीखो, भाई के लिए त्याग करना सीखना है तो राम से, भाई के लिए जीना सीखना है तो भरत से ,भाई के लिए मौन रहना सीखना है तो शत्रुघन सेसे सीखो।

प्रवचन देते असंग देव जी महाराज।
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