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इच्छा व आकांक्षा ही दुख का कारण जाकाे कछू न चाहिए, साेई शाहंशाह

एक वर्ष पहले
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संत शाही स्वामी जी महाराज

सद्ग्रंथाें काे पढ़ने से मालूम हाेता है कि जबसे मनुष्य की सृष्टि है, तभी से ज्ञान का प्रचार हाे रहा है। एक ताे संसार में जाने का रास्ता है अर्थात आवागमन के चक्र का रास्ता और दूसरा है संसार से छूटक जाने का रास्ता अर्थात माेक्ष का रास्ता। यह जाे माेक्ष में जाने का विचार है, यह बहुत पुराना है।

संसार में आवागमन से छूटकर रहने में संताें ने बड़ा कल्याण बताया है। जाे आवागमन के चक्र से छूटकर रहता है, वह सारे दुखाें से छूटकर रहता है। वह उस सुख काे प्राप्त करता है, जिसके बाद फिर कुछ पाने काे नहीं रह जाता। सूरदास महाराज ने लिखा है-

अविगत गति कछु कहत न आवै।

ज्याें गूंगहिं मीठे फल काे रस, अंतरगत ही भावै।

परम स्वाद सब ही जु निरंतर अमित ताेष उपजावै।

यानी यह सुख अमित ताेष उपजानेवाला है। ताेष का अर्थ है जब आकांक्षा बची न रहे। पूर्ण संताेष हाे जाए।

चाह गई चिंता मिटी, मनुआं बेपरवाह।

जाकाे कछू न चाहिए, साेई शाहंशाह।

यह जाे सुख है, यह मन-वाणी काे अगम-अगाेचर है। वाणी से उस सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता है। वह सुख जीवात्मा काे मिलता है। यह सुख जिसे मिल जाता है, वह संसार के विषयाें में नहीं दाैड़ता है। परमात्मा की भक्ति करनेवाले काे ही यह सुख मिलता है। वेदमंत्र में आया है कि जिसकी भक्ति करके एेसा सुख प्राप्त हाेता है, जिसे पा लेने के बाद पाने काे कुछ शेष नहीं रह जाता।

जिस सुख काे पा लेने के बाद सारे दुखाें का अंत हाे जाता है, यह वही परमात्मा है। दादू दयाल जी महाराज ने लिखा है कि दादू सिरजनहार के, केते नांव अनंत। यह जाे सृष्टिकर्ता है, उसके अनेक नाम है। चित आवै साे लीजिए, याैं साधू सुमिरै संत। एेसे ही विचाराें की गंगा बहेगी अखिल भारतीय संतमत-सत्संग के 109 वें वार्षिक महाधिवेशन में, जाे 14 से 16 मार्च काे कहलगांव (भागलपुर) में हाेने जा रहा है।
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