टीएमबीयू में ही काॅपी की जांच फिर भी समय पर रिजल्ट नहीं
कई विषयाें की काॅपियाें का मूल्यांकन करने के लिए शिक्षक ही नहीं
रिजल्ट में देरी हाेने का तर्क देकर टीएमबीयू में ही काॅपी की जांच की व्यवस्था करने के बावजूद रिजल्ट में विलंब हाे रहा है। पूर्व में स्नातक पार्ट थ्री के अार्ट्स के रिजल्ट में लगभग 2 महीने की देरी के बाद अब पीएचडी एडमिशन टेस्ट के रिजल्ट में भी वही हाल हाे रहा है। 21 जनवरी काे हुए पीएचडी एडमिशन टेस्ट का रिजल्ट अब तक जारी नहीं हाे सका है। इतने दिन के बाद भी विश्वविद्यालय के अधिकारी यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि रिजल्ट कब तक जारी हाेगा। पूर्व में टीएमबीयू में प्री-पीएचडी टेस्ट जाे अब पीएचडी एडमिशन टेस्ट से नाम से जाना जाता है, की काॅपियाें की जांच टीएमबीयू के बाहर हाेती थी। पीजी के फाइनल ईयर अाैर स्नातक पार्ट थ्री का मूल्यांकन भी बाहर हाेता था, लेकिन 2011-12 में तत्कालीन कुलपति बिमल कुमार ने प्री-पीएचडी, स्नातक पार्ट थ्री अाैर एमबीए की काॅपियां मूल्यांकन के लिए बिहार विश्वविद्यालय भेजी, लेकिन मूल्यांकन वहां हाॅस्टलाें में रह रहे छात्राें से करवा दी। मूल्यांकन हाेने अाैर काॅपियां वापस टीएमबीयू अाने में 8 महीने से ज्यादा लग गए। पूर्व कुलपति अारएस दुबे के समय विवि में ही मूल्यांकन करना तय हुआ था।
काॅपी जांच के कार्य को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं विवि के शिक्षक
पैट की बात करें ताे हाेली की छुट्टी हाेने से पहले 7 मार्च तक 4 या 5 विषयाें की काॅपियाें का बंडल यूं ही पड़ा हुअा था। एक अधिकारी ने बताया कि संबंधित विषयाें के शिक्षक ही नहीं अा रहे। 2 या 3 विषय ताे एेसे हैं जिनमें एक-एक शिक्षक काे 200 काॅपियां दी गई हैं। इससे भी देरी हाे रही है। शिक्षकाें से संपर्क किया जाता है, लेकिन वे लाेग गंभीरता से नहीं लेते हैं। दूसरी तरफ कुछ विषयाें का मूल्यांकन पीजी हेड से कराया जा रहा है ताे कुछ विषयाें की काॅपी की जांच काॅलेजाें के शिक्षकाें से करा लिया गया।
अाेएमअार शीट की जांच हाथ से कर रहे
अाेएमअार शीट पर दिए गए उत्तर की जांच भी शिक्षक ही कर रहे हैं। जबकि इसकी जांच कंप्यूटर से हाेनी चाहिए थी। अाेएमअार शीट का प्रयाेग ही इसलिए हाेता है कि कंप्यूटर से काॅपी की तुरंत जांच हाे जाए, लेकिन यहां की पूरी व्यवस्था ही हास्यास्पद है। शिक्षक छात्राें के भरे गए गाेले के बगल में सही अाैर गलत का निशान लगा रहे हैं। इसमें यह जांच भी नहीं हाे पाएगी कि छात्र ने सही से गाेले काे भरा या नहीं। कंप्यूटर से जांच हाेती तभी तकनीकी गलती काे पकड़ा जा सकता था।