पहले 5000, अब 2 लाख में फार्मासिस्ट का लाइसेंस, इसलिए पूरा पत्ता थमा रहे

Bhagalpur News - शहर में दवा बिक्री के नाम पर मरीजों से हो रही लूट में नया खुलासा हुआ है। लोगों की जेब पर डाका डालने में दवा...

Bhaskar News Network

Jun 13, 2019, 06:45 AM IST
Bhagalpur News - first 5000 now the license of pharmacist in 2 lakhs
शहर में दवा बिक्री के नाम पर मरीजों से हो रही लूट में नया खुलासा हुआ है। लोगों की जेब पर डाका डालने में दवा दुकानदारों के साथ सिर्फ ड्रग डिपार्टमेंट ही नहीं, बल्कि फार्मासिस्ट भी शामिल हैं। कुछ साल पहले तक अपना लाइसेंस दवा दुकानों को देने के के लिए वे जहां 3500-5000 रुपए तक पैसा ले रहे थे, अब वे सालाना डेढ़ से दो लाख रुपए तक वसूल रहे हैं। ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में आई तब्दीली और सरकार की सख्ती के बाद दवा दुकान के लाइसेंस में परेशानी बढ़ी तो फार्मासिस्ट की चांदी हो गई। फार्मासिस्ट की इस चांदी में ड्रग डिपार्टमेंट भी साथ हो गया और दुकानदारों को लूट की मौन छूट दे दी। इसका खुलासा ड्रग डिपार्टमेंट के ही एक बाबू निरंजन कुमार ने किया। दवा दुकानदारों के पक्ष में खड़े हो उन्होंने यह कहा कि दुकानदार क्या करेंगे? फार्मासिस्ट अपना लाइसेंस देने के लिए डेढ़ से दो लाख रुपए तक ले रहे हैं। इस मिलीभगत के खुलासे के साथ ही यह भी साफ हो गया कि दुकानदार नियमों को ताक पर रखकर मरीजों को इसलिए पूरा पत्ता थमा रहे हैं कि उनका मुनाफा बढ़े और वे अपने मुनाफे से सालाना दो लाख रुपए फार्मासिस्ट को दे सकें।

पूरे राज्य में थोक और खुदरा दवा दुकानों की संख्या करीब 40 हजार है। ये दुकानें करीब 13 हजार फार्मासिस्ट के भरोसे ही चलाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में भागलपुर में 1500 थोक और खुदरा दवा दुकानें चलाई जा रही हैं। इन दुकानों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने यहां एक असिस्टेंट ड्रग कंट्रोलर प्रदीप कुमार और 5 ड्रग इंस्पेक्टर दयानंद प्रसाद, जितेंद्र कुमार सिन्हा, अनिल कुमार, सत्येंद्र कुमार, किरण कुमारी को तैनात किया है।

ड्रग डिपार्टमेंट के बाबू के बयान से ही खुली अफसर-कर्मचारियों की मिलीभगत की पोल

पहले : पहले दवा दुकान खोलने के लिए फार्मासिस्ट का लाइसेंस देना होता था। फार्मासिस्ट अपना लाइसेंस नंबर देते थे और इसके एवज में अलग-अलग दुकानों से 3500 से 5000 रुपए तक चार्ज करते थे। इससे दुकानदारों को फार्मासिस्ट की फीस देने के लिए रोजाना महज 9.58 रुपए से 13 रुपए तक की जरूरत होती थी। दवा के मुनाफे में यह राशि अपेक्षाकृत बेहद कम थी। इसलिए दवा दुकानदार खुले तौर पर हर तरह से दवा की बिक्री करते थे। वे मरीजों की जरूरत समझकर टैबलेट और कैप्सूल के पत्ते से दो-तीन दवा भी देते थे और गैर-जरूरी दवा की वापसी भी होती थी।

अब : अब फार्मासिस्ट ने दवा दुकान खोलने वालों को अपना लाइसेंस नंबर देने की दरें 20 गुना तक बढ़ा दी। डेढ़ से दो लाख सालाना से कम पर वे अपना लाइसेंस देने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में दवा दुकानदारों पर रोजाना 410 से 547 रुपए तक भार बढ़ गया। रोजाना 410-547 रुपए की वसूली के लिए दुकानदारों ने मरीजों से लूट का जाल बिछाया और ज्यादा मुनाफा के लिए ज्यादा दवा की ज्यादा बिक्री को अपना हथियार बना लिया। उन्होंने टैबलेट और कैप्सूल के पत्ते से काटकर दवा देने से इनकार कर दिया। गैर-जरूरी दवा की वापसी भी बंद कर दी।

सरकार ने जारी किया आदेश तो विरोध भी हुआ

सरकार ने दवा दुकानों में पारदर्शिता के लिए जो गाइडलाइन बनाई थी, उसका भी दवा दुकानदार विरोध कर चुके हैं। यह विरोध भी दवा दुकानदार, ड्रग डिपार्टमेंट और फार्मासिस्ट की मिलीभगत की पोल खोल रहा है। मालूम हो कि 2017 में सरकार ने फार्मासिस्ट का नाम और उनके वेतन भुगतान को ऑनलाइन करने के आदेश दिए थे। इसके विरोध में दुकानदारों ने पूरे राज्य में काला बिल्ला भी लगाया। दुकानें बंद कर प्रदर्शन भी किया। एसोसिएशन ने तर्क दिया था कि इस आदेश से दवा दुकानदारों की परेशानी बढ़ जाएगी। फार्मासिस्ट कम हैं और दुकानें ज्यादा। दवा दुकानों में फर्मासिस्ट का नाम और वेतन भुगतान की ऑनलाइन जानकारी देना उचित नहीं है। इस विरोध से साफ है कि ऑनलाइन भुगतान और फार्मासिस्ट का नाम उजागर होने से यह स्पष्ट हो जाता कि दुकानदारों पर क्या बोझ पड़ा है और इसकी भरपाई वे कैसे कर रहे हैं।

अभी कुछ नहीं कह सकता

इससे समझिए लूट का गणित

मैं अभी तो कुछ नहीं कह सकता। कल दफ्तर आइए, वहीं बात होगी। - प्रदीप कुमार, असिस्टेंट ड्रग कंट्रोलर, भागलपुर

पहले : पहले दवा दुकान खोलने के लिए फार्मासिस्ट का लाइसेंस देना होता था। फार्मासिस्ट अपना लाइसेंस नंबर देते थे और इसके एवज में अलग-अलग दुकानों से 3500 से 5000 रुपए तक चार्ज करते थे। इससे दुकानदारों को फार्मासिस्ट की फीस देने के लिए रोजाना महज 9.58 रुपए से 13 रुपए तक की जरूरत होती थी। दवा के मुनाफे में यह राशि अपेक्षाकृत बेहद कम थी। इसलिए दवा दुकानदार खुले तौर पर हर तरह से दवा की बिक्री करते थे। वे मरीजों की जरूरत समझकर टैबलेट और कैप्सूल के पत्ते से दो-तीन दवा भी देते थे और गैर-जरूरी दवा की वापसी भी होती थी।

अब : अब फार्मासिस्ट ने दवा दुकान खोलने वालों को अपना लाइसेंस नंबर देने की दरें 20 गुना तक बढ़ा दी। डेढ़ से दो लाख सालाना से कम पर वे अपना लाइसेंस देने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में दवा दुकानदारों पर रोजाना 410 से 547 रुपए तक भार बढ़ गया। रोजाना 410-547 रुपए की वसूली के लिए दुकानदारों ने मरीजों से लूट का जाल बिछाया और ज्यादा मुनाफा के लिए ज्यादा दवा की ज्यादा बिक्री को अपना हथियार बना लिया। उन्होंने टैबलेट और कैप्सूल के पत्ते से काटकर दवा देने से इनकार कर दिया। गैर-जरूरी दवा की वापसी भी बंद कर दी।

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