बदहाल स्कूलों का अंग बने शिक्षकों को यह भरोसा नहीं कि यहां उनके बच्चे काबिल बनेंगे

Bhagalpur News - कई स्कूलों को भवन व बाउंड्रीवॉल तक नहीं हैं पेशा शिक्षक...काम, देश के भविष्य को गढ़ना। उन्हें काबिल बनाना और...

Feb 23, 2020, 06:50 AM IST
{कई स्कूलों को भवन व बाउंड्रीवॉल तक नहीं हैं

पेशा शिक्षक...काम, देश के भविष्य को गढ़ना। उन्हें काबिल बनाना और एकेडमिक एजुकेशन अाैर प्रतियाेगी परीक्षाअाें के लिए दक्ष बनाना है। इसके लिए सरकार ने स्कूल की इमारतें बनाई, शिक्षकों को उनके काम के लिए वेतन दे रही है। रिटायरमेंट के बाद पुराने शिक्षकों को पेंशन सुविधा भी है। लेकिन दूसरे के बच्चाें को स्कूल में जैसे-तैसे पढ़ाने वाले ये शिक्षक तब अपने कदम पीछे खींच रहे हैं, जब उनके बच्चाें के तालीम की बारी आती है। वे अपने ही संस्थान में बच्चों को नहीं पढ़ाना चाहते।

उन्हें यही भरोसा नहीं हो पा रहा कि वे जहां पढ़ा रहे हैं, वहां पढ़कर उनके बच्चे काबिल बन सकेंगे। गुरुवार को सूबे की शिक्षा व्यवस्था पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट की टिप्पणी पर दैनिक भास्कर ने शुक्रवार को जिले के सरकारी स्कूल और कॉलेजों में काम कर रहे शिक्षकों के बच्चों की पढ़ाई की पड़ताल की तो कई तरह की स्थिति और चुनौतियां सामने आई। इसमें सामने आया कि अधिकतर शिक्षक अपने बच्चों के लिए निजी स्कूल चुनते हैं। साथ ही यह भी सामने आया कि स्कूलों में संसाधन और सुविधाओं का अभाव है। बड़ी वजह यह भी है कि शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक काम में लगाए जाने से स्कूलों मंे पढ़ाई नहीं हो रही है।

व्यवस्था सुधारने पर चल रहा है काम

स्कूलाें में शैक्षणिक व्यवस्था सुधारने के लिए लगातार काम चल रहा है। अाधारभूत संरचना भी ठीक कराई जा रही है। स्कूलों में शिक्षकाें की कमी राज्य स्तर पर है। हालांकि अतिथि शिक्षकाें की भी सेवा ली जा रही है। व्यवस्था सुधारने की कवायद चल रही है।
- संजय सिह, प्रभारी डीईअाे

ये कमियां भी आती हैं आड़े


भवन जर्जर, शिक्षकाें की कमी, विषयवार शिक्षक नहीं, शिक्षकाें से गैर शैक्षणिक कार्य, लैब-लाइब्रेरी का खस्ताहाल।

दूसरे काम शिक्षकों से करवाए जा रहे

सुमन सोनी, शिक्षिका, बिहारी कन्या मध्य विद्यालय, प्रदेश उपाध्यक्ष, बीपीपीएमएसएस

दाे बच्चाें ने डीएवी पब्लिक स्कूल से पढ़ाई की है। इनमें एक अभी बीडीएस कर रही है अाैर एक इंजीनियरिंग कर रहा है।

 राज्य सरकार शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक काम में लगा रही है। पढ़ाने का मौका नहीं दे रही। मिड-डे-मील में दो घंटे लगते हैं। बीएलअाे, जनगणना, वाेटर अाईडी कार्ड समेत सभी काम कराए जाते हैं। एेसे में कैसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी।

महिलाओं के दबाव में निजी स्कूल भेजे

संजीव कुमार, शिक्षक, मध्य विद्यालय भीखनपुर

नगर अध्यक्ष, जिला प्राथमिक शिक्षक संघ

दो बेटियाें की पढ़ाई निजी स्कूल न्यू सेंचुरी से हो चुकी है। एक बेटा न्यू सेंचुरी स्कूल से हो रही है।

परिवार का दबाव था। निजी स्कूल में पढ़ाई करवाने के लिए घर की महिलाओं का दबाव था।

5वीं तक बेटे को पढ़ाया, सभी विषय की नहीं हो रही थी पढ़ाई, इसलिए सरकारी स्कूल से हटाया

श्यामनंदन सिंह, शिक्षक, बीएमसी उर्दू मध्य विद्यालय, बिहपुर

प्रदेश जिला सचिव, बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ गोपगुट

संसाधन ही नहीं, इसलिए नहीं पढ़ाते

राणा कुणाल सिंह, शिक्षक, प्राथमिक विद्यालय पचरुखी धोरैया, बांका

प्रमंडलीय अध्यक्ष, परिवर्तनकारी प्रारंभिक शिक्षक संघ

{उन्हें लैब, लाइब्रेरी की भी सुविधा नहीं है

 जस्टिस वी. मिश्रा, नवीन कुमार, आईएएस, वित्त विभाग, बिहार सरकार अाैर इंग्लैंड में काम कर रहे डॉ. आर. लाल।

बुलाे मंडल, पूर्व सांसद।

डाॅ. मनाेज कुमार।

ये तो सरकारी स्कूलों से ही निकले

5% ही पढ़ा रहे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल-कॉलेजों में

हालांकि टीएमबीयू के कुछ शिक्षक सहित सरकारी स्कूलाें के कुछ एेसे शिक्षक भी हैं जिन्हें अपने संस्थान की पढ़ाई पर भराेसा है अाैर इनके बच्चे सरकारी स्कूल-काॅलेजाें में पढ़े हैं। लेकिन एेेसे शिक्षक पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं। टीएमबीयू अाैर सरकारी स्कूलाें के शेष ज्यादातर शिक्षकाें के बच्चाें की स्कूलिंग निजी सीबीएसई अाैर अाईसीएसई स्कूलाें में हाेती है।

सरकारी स्कूलाें में बच्चाें काे कैसे पढ़ाएं। भवन जर्जर है। शाैचालय और बाउंड्रीवॉल नहीं है। शिक्षक स्कूल में हैं, लेकिन बच्चाें काे कैसे वहां ले जाएं।

उनकी पांच साल की बेटी जीडी गाेयनका में पढ़ती है। पिछले ही साल उसका दाखिला निजी स्कूल में करवाया।


उनके बेटे ने 5वीं तक मध्य विद्यालय पछियारी टाेला पढ़ाई की। लेकिन अागे की पढ़ाई एसकेपी अाैर चाैहान पब्लिक स्कूल में हुई।

प्रारंभिक तक पढ़ाने के बाद मजबूरी में प्राइवेट स्कूल भेजना पड़ा, क्याेंकि स्कूल में विषयवार शिक्षक नहीं थे।

स्कूलों में विषयवार शिक्षक नहीं हैं, शिक्षक कर रहे गैर-शैक्षणिक काम

यह तस्वीर नाथनगर के अजमेरीपुर में नवसृजित प्राथमिक विद्यालय की है। यहां भवन के अभाव में ऐसे पढ़ाई होती है।

  सरकारी स्कूलों में पढ़ें अफसरों के बच्चे तभी सुधार है संभव

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