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नारी के आत्मसंघर्ष केॅ लै केॅ उपन्यास बिहुला-विषहरी

एक वर्ष पहले
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उपन्यासकारोॅ सेॅ मिलवावेॅ, मतर कोराना कॅे खतम हुवेॅ दौ

हेनाकेॅ तेॅ धनंजय मिश्र नेॅ भी गोपीचंद उपन्यास लिखलेॅ छै, मतुर मौलिक कुछुवो नै बनेॅ पारलोॅ छै, हेकरा सेॅ तेॅ बेसी साहित्यिक चंद्रप्रकाश जगप्रिय के उपन्यास वृजाभार छौं। देखै छौ नी, छै तेॅ पतले रं, मतुर कथा कॅे विश्वसनीय रूप दै के कोशिश ई उपन्यास के खूब होलोॅ छै। है बेॅ देखोॅ, दिनेश तपन के उपन्यास ‘रेशमा चौहरमल’ तेॅ किताबोॅ के उपरे में धरलोेॅ रही गेलै । रेशमा के रूप गढ़ै में कोय कोर कसर नें राखलेेॅ छै,तपन बाबा। लिखै के तेॅ विद्यो जीं रानी सुरंगा उपन्यासो लिखने छै। की-की, कत्तेॅ सुनैयौं, ननद? नै सुनावोॅ वोदी, मतुर भागलपुरोॅ के है सब उपन्यासकारोॅ सेॅ मिलवावेॅ तेॅ पारहै छोॅ। कैन्हें नी, मतर है कोराना बीमारी कॅे खतम हुवेॅ दौ।

दू पहाडी बहिन पर हिरनी-बिरनी उपन्यास गजब छै

मूले के बात के लैके ते एक दाफी कथाकार रंजन आरो शिव कुमार शिव भिड़ी गेलोॅ छेलै, कैन्हें कि शिव के जे उपन्यास महुआ घटवारिन, के महुआ घटवारिन आखरी मेॅ फूलन देवी रं बनी गेलोॅ छै, जों कविता मे कहलोॅ जाय। ई दृष्टि सेॅ डा. मृदुला शुक्ला के है जे दू पहाडी बहिन पर हिरनी-बिरनी उपन्यास छौं, गजब के छै, एकदम गपस, कहीं उबान नै। नारी-विमर्श के ख्यालो से गजब। ई विमर्श के ख्यालो सेॅ डा. अमरेन्द्र के उपन्यासो सलेस भगत कम नै छै। मतुर डा. मीरा झा के है ठो हिन्नेॅ राखलोॅ उपन्यास बिहुला-विषहरी नारी के आत्मसंघर्ष केॅ लै केॅ बड़ा उल्लेखनीय छौं।



आरो नै तेॅ की, भले भागलपुर एक पस्सर नांखी बची गेलोॅ रहेॅ, लिखै-पढ़ै मेॅ कोेबोॅ भरी सॅे कटियो टा कम नै बूझोॅ, ननद। है जे अलमारी मेॅ भारी भरकम उपन्यास देखै छौ, ई भेलौं कुंवर नटुआ दयाल रंजन जी के लिखलोॅ। नाच-गान के तांत्रिक रहस्य जानना छाैं, तेॅ यैसेॅ बढ़िया उपन्यास आरो नै। है रहस्य रोमांस तेॅ तोरा अंजनी कुमार शर्मा रोॅ ई दोनों उपन्यास बाबा विसु राउत आरो सोरठी वृजाभार मेॅ मिली जैथौं, यही लेॅ तेॅ डा. योगेन्द्र बोलै छै, अंजनी जी के उपन्यास पढ़ी केॅ खूब आनंद आवै छै। देखोॅ ननद, जेे अंगिका लोकगाथा पर रंजन जी उपन्यास लिखलकै, वही लोकगाथा पर डा. विद्या रानी ठेठिये मेॅ उपन्यास लिखी देलकै। नामो देलकै तेॅ वहा नटुआ दयाल। खाली कुंवर हटाय देलकै। नटुवे दयाल के बात नै छै, ननद। हेनोॅ आरो एक अंगिका लोकगाथा छै, जै पर तीन-तीन ठो उपन्यास लिखलोॅ गेलोॅ छै। ऊ लोकगाथा छेकै, लचिका रानी। देखी रहलोॅ छौ नी, ई छेकौं, डा. विद्या रानी के लिखलोॅ लचिका रानी, ई डा. प्रतिभा राजहंस के लिखलोॅ प्रतिशोध आरो ई अनिरुद्ध प्रसाद विमल रोॅ लिखलोॅ रानी लचिका। तनी-मनी शीर्षक के अंतर से सबमेॅ मूल बचाय के कोशिश होलो छै।


डाॅ. अमरेंद्र/अंगिका के वरिष्ठ साहित्यकार


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