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31 जिले के सदर अस्पतालों में सीटी स्कैन की चर्चा नहीं, चार में मशीन आकर पड़ी है, एक में स्कैनिंग सुविधा की फाइल घूम रही

Bhagalpur News - दुआ कीजिए कि कोई हादसा न हो! बदकिस्मती से हो भी तो दिमाग पर चोट न लगे। अंदरूनी या बाहरी- कैसी भी। अगर किस्मत इतनी ही...

Feb 22, 2020, 06:55 AM IST
Bhagalpur News - there is no discussion of ct scan in sadar hospitals of 31 district machine is lying in four file of scanning facility is rotating in one

दुआ कीजिए कि कोई हादसा न हो! बदकिस्मती से हो भी तो दिमाग पर चोट न लगे। अंदरूनी या बाहरी- कैसी भी। अगर किस्मत इतनी ही बुरी निकले तो बिहार के 11 जिलों में तो नहीं ही हो। सड़क हादसों में लगातार हो रही मौतों, बीपी की बढ़ती शिकायतों के कारण ब्रेन हेमरेज की डरावनी होती हकीकत और हर जाड़े में आ रहे ब्रेन स्ट्रोक के केस के बावजूद यह हालत है। पटना समेत छह जिलों में चल रहे कुल सात सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में ही सरकारी सीटी जांच हो रही है। 38 जिलों में पटना और दरभंगा में जिला अस्पताल नहीं है। बाकी, 36 के भी जिलास्तरीय सदर अस्पताल में यह जांच नहीं होती।

पड़ताल में दिमाग की जांच का सरकारी उपाय सिर्फ छह जिलों में दिखता है। इन छह के साथ 21 अन्य में भी प्राइवेट का उपाय लग जाता है, लेकिन 11 जिलों जहानाबाद, लखीसराय, कैमूर, सीतामढ़ी, सुपौल, शिवहर, जमुई, अररिवया, बांका, शेखपुरा और अरवल में न तो सरकारी है और न ही प्राइवेट जांच। हर सदर अस्पताल में सीटी स्कैन के लिए पिछले साल जुलाई में विधान परिषद् में सरकार की घोषणा की बावजूद अबतक प्रदेश के 30 जिलों के सदर अस्पतालों में सीटी स्कैन की चर्चा तक नहीं पहुंची है। राजधानी पटना में जिला अस्पताल की जगह चमकते गार्डिनर, शास्त्रीनगर, गर्दनीबाग जैसे मॉडल अस्पताल भी सुविधा नहीं है। छह जिलों में स्थापित एक-एक और राजधानी के दो मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में सीटी स्कैन के कारण भीड़ की मारामारी में जांच कराएं या जान बचाएं वाली हालत है।

ब्रेन में ब्लड क्लॉटिंग को समझना आम एमबीबीएस के लिए संभव नहीं है और किसी जिला-सदर अस्पताल में न्यूरो का कोई जानकार डॉक्टर नहीं है। सिर पर गहरी या अंदरूनी चोट के साथ ही ब्रेन स्ट्रोक या ब्रेन हेमरेज के लक्षण दिख जाएं तो बीपी, शुगर जैसे टेस्ट के साथ या इनमें से कुछ भी किए बगैर तत्काल सीटी स्कैन देखना होता है। एक्सीडेंट (ट्रॉमा) के कारण सिर फटने, हेमरेज या ब्रेन स्ट्रोक में इंटरनल इंजरी-क्लॉटिंग की स्थिति में प्राइवेट सीटी स्कैन जांच के कई विकल्प 16 जिलों में हैं, 11 जिलों में जांच होती तो है लेकिन कब सुविधा मिलेगी और कब नहीं- यह पक्का नहीं रहता। इन 11 जिलों किशनगंज, नवादा, खगड़िया, हाजीपुर, बक्सर, मुंगेर, सीवान, मोतिहारी, गोपालगंज, औरंगाबाद और सासाराम में से ज्यादातर जगह एक ही सीटी स्कैन कार्यरत रहने की जानकारी सामने आई।

अपने अस्पताल में इलाज नहीं, गोरखपुर रेफर

सबसे ज्यादा मृत्यु-दर वाले हादसे जिस सीवान में हो रहे, वहां 14 फरवरी को रघुनाथपुर-सिसवन मार्ग पर मध्य विद्यालय के दो शिक्षकों के साथ हुए सड़क हादसे से इलाज तक की स्थिति सारी हकीकत बेपर्द कर रही। वाकये के चश्मदीद हरदेव साह की जुबानी….

शाम करीब साढ़े सात बजे होंगे। शिक्षक राजेश प्रसाद और लखन प्रसाद जिला मुख्यालय स्थित डीईओ कार्यालय से बाइक पर कचनार लौट रहे थे। सामने से आ रहे ट्रक ने ऐसा धक्का मारा कि कुछ सेकंड्स के अंदर भीड़ जुट गई। वीभत्स स्थिति देख कोई हाथ नहीं लगाना चाह रहा था। लोग आधे घंटे तक पुलिस को फोन करते रहे, लेकिन कोई नहीं आया। फिर मौजूद लोगों ने ही दोनों को सिसवन रेफरल अस्पताल पहुंचाया। यहां राजेश प्रसाद को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। लखन प्रसाद को भी गंभीर चोटें थीं। एक की मौत, अस्पताल में कोई व्यवस्था नहीं देख गुस्सा बढ़ रहा था। घंटाभर गुजरा होगा तो एएसआई के नेतृत्व में पुलिस टीम आई। लोगों ने एएसआई पर हाथ चला दिया। जीप पलट दी। ऑन ड्यूटी डॉक्टर सहम गए। अस्पताल में सफाई-मरहम से ज्यादा कुछ नहीं और मरीज के गंभीर होने की बात कह लखन प्रसाद को सीवान सदर अस्पताल रेफर करने की पर्ची बना दी। परिजन आ गए थे। लोकल स्तर पर एम्बुलेंस का जुगाड़ किया, लेकिन कोई सदर अस्पताल ले जाने के पक्ष में नहीं था। लोगों ने वहां पिछले दिनों एक हादसे में कोई इलाज नहीं मिलने की बात कही तो परिजन किसी प्राइवेट हॉस्पिटल लेकर निकल गए। वहां भी मरीज को रात में ही गोरखपुर रेफर करना पड़ा।

असल-नकल पहचान जरूरी तभी जिंदगी की संंभावना

न्यूरो सर्जन का बोर्ड लगाने वाले कई जगह, मगर सिर्फ एमसीएच-डीएनबी वाले ही सही हैं

जिसे भी सिर में गंभीर चोट लगती है, उसके परिजन बदहवास होकर कोई भी आसरा ढूंढ़ने लगते हैं। डॉक्टर के बोर्ड देखते हैं, डिग्री नहीं और केस खराब करवा लेते हैं। एमबीबीएस-एमएस नहीं, एमसीएच या डीएनबी (न्यूरो सर्जरी) वाले डॉक्टर ही सिर खोल सकते हैं, बाकी किसी के हाथों में सिर देना खतरनाक है। पड़ताल में सामने आया कि गोपालगंज के एक अस्पताल अपने डॉक्टर को रीढ़, नस एवं दर्द रोग विशेषज्ञ के साथ न्यूरो सर्जन भी बता रहा है, लेकिन डिग्री का विवरण नहीं दे रहा। समस्तीपुर, नालंदा, मुजफ्फरपुर आदि में एफआरएसएच, पीजीसीसी, एफएवीसी, एफआईसीएम वाले भी खुद को न्यूरो सर्जरी विशेषज्ञ बताकर मरीज देख रहे हैं।

संयोजन-संपादनकुमार जितेंद्र ज्योति

मृत्यु-दर में सबसे आगे सीवान से लाइव

30

4

4 में मशीन आकर पड़ी
है, एक की
फाइल घूम रही


30 जिला अस्पतालों में सिटी स्कैन
की चर्चा नहीं


भागलपुर में दिख रही कुछ गति

अंदरूनी-बाहरी चोट में दवा-आईसीयू तुरंत

सदर में प्राथमिक इलाज के लिए मुंगेर और छपरा में ही आईसीयू

प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में आईसीयू की सुविधा है भी तो पटना में पीएमसीएच-एनएमसीएच के अलावा सिर्फ भागलपुर के जेएलएनएमसीएच, दरभंगा के डीएमसीएच और गया के एएनएमसीएच में न्यूरो सर्जन हैं। प्रदेश के 11 जिलों के सदर अस्पतालों में आईसीयू या सीसीयू बने हैं, इनमें सिर्फ मुंगेर में ही चालू था। भास्कर की खबर के बाद छपरा में आईसीयू को ऑपरेशनल किया गया। कैमूर, गोपालगंज, सासाराम, बेतिया, पूर्णिया, मधेपुरा, सहरसा, जहानाबाद और हाजीपुर में सीसीयू-आईसीयू अब भी बेकार कमरे की तरह ही हैं। वैसे, रहते तो भी न्यूरो सर्जन के नहीं रहने के कारण इस काम के लायक तो नहीं ही होते।

11 जिलों में प्राइवेट लैब ऐसे काम करते हैं कि जांच कब होगी, कब नहीं- पता नहीं

कहीं मशीन पड़ी है, कहीं लगकर खड़ी है...मगर, 32 सदर अस्पतालों को तो कुछ पता ही नहीं

{पटना और दरभंगा में नहीं जिला अस्पताल, राजधानी के ‘मॉडल’ सरकारी अस्पतालों में सुविधा नहीं{16 जिलों में प्राइवेट स्कैन का विकल्प, 11 जिलों में कभी सुविधा मिलेगी तो कभी नहीं भी संभव है

दिल से दिमाग का बुरा हाल

इनपुट: नीतीश कुमार सोनी (पटना), नवीन पाठक (बक्सर), अशोक प्रियदर्शी (नवादा), संजीव कुमार (नालंदा), ज्योति कुमार निराला (हाजीपुर), चंदन कुमार (शेखपुरा), शशिरंजन पांडेय (रोहतास), गोपाल मिश्रा (गोपालगंज), अमन कुमार सिंह (छपरा), निरंजन कुमार सिन्हा व नवीन कुमार (बेगूसराय), कौशल पाठक (कैमूर), राकेश कुमार सिंह (आरा), बिनोद कुमार (अरवल), ओम प्रकाश सिंह (औरंगाबाद), कृष्ण मुरारी पांडेय (सीवान), मृत्युंजय कुमार (जहानाबाद), नारायण मिश्रा (गया), केशव कुमार (मुजफ्फरपुर), लक्ष्मीकांत सिंह (समस्तीपुर), गजेंद्र सिंह (दरभंगा), सोनू कुमार (मधुबनी), सुबोध कुमार (सीतामढ़ी), हेमंत कुमार सिंह (शिवहर), करुणेश केशव (बेतिया), संजय कुमार सिंह (मोतिहारी), डॉ. दयानंद भारती (सुपौल), त्रिपुरारि (भागलपुर), नवीन निशांत (सहरसा), मनोहर व नागेश्वर (पूर्णिया), कुमार अनुज (खगड़िया), मनीष वत्स (मधेपुरा), नीरज (किशनगंज), मुरली दीक्षित (जमुई), बिदुशेखर (बांका), विनोद कुमार वर्मा (लखीसराय), आमोद व अनित (अररिया), संतोष सहाय (मुंगेर), पंकज कुमार (कटिहार)।

सदर अस्पतालों में सीटी स्कैन लगाने की प्रक्रिया जहां चल भी रही, वहां बहुत धीमी है। भागलपुर में सिविल वर्क चल रहा है। मशीन आई हुई है। नालंदा में मशीन आकर भी नहीं चल पाने से और भी हकीकत साफ हो रही है। आरा में आधी अधूरी व्यवस्था बनकर रह गई, लेकिन सीटी स्कैनिंग सुविधा यहां भी शुरू नहीं हो सकी है। सासाराम में मशीन आकर रखी है, लेकिन जांच शुरू कराने से संबंधित बाकी काम अभी प्रक्रियाधीन हैं। बेगूसराय में सीटी स्कैन मशीन लगाने की प्रक्रिया फाइलों में ही चल रही है। काम पटना की एजेंसी कर रही- सदर अस्पताल वाले इससे ज्यादा कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं दिख रहे।

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