डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद की जयंती पर संगोष्ठी

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
नवनालंदा महाविहार का नींव रखने वाले भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती मनाई गई। महाविहार का नींव 20 नवंबर 1951 को डाॅ. राजेंद्र प्रसाद ने डाली थी। इतने बरसों के बाद आज राजेंद्र प्रसाद जी की जयंती का आयोजन कर नवनालंदा महाविहार ने भूल सुधार किया। इस अवसर पर महाविहार के पुस्तकालय भवन का नामकरण डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम पर करते हुए उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की गई। अबसे पुस्तकालय का नाम डॉ. राजेंद्र प्रसाद पुस्तकालय के नाम से जाना जाएगा। इसकी घोषणा कुलपति प्रोफेसर बैद्यनाथ लाभ ने की। इस अवसर पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी भी आयोजित की गई। संगोष्ठी का विषय देशर| डॉ राजेंद्र प्रसाद का राजनीतिक एवं दार्शनिक योगदान था। संगोष्ठी का उद्घाटन कुलपति प्रोफेसर श्री लाभ एवं पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेश्वर सती प्रसाद, दर्शन शास्त्र विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आरसी सिन्हा ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर स्वागत भाषण गोष्टी में संयोजक डॉ. श्रीकांत सिंह ने दी। समारोह में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व इतिहास विभागाध्यक्ष प्रोफेसर रामेश्वर मिश्र ने कहा कि इतिहास भूल करता है तो भूल सुधार किया जाना चाहिए। नव नालंदा महाविहार ने भूल सुधार कर लिया है। उन्होंने कहा कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद विलक्षण प्रतिभा के धनी थे साथ ही महात्मा व स्वाभिमान थे। मुख्य अतिथि पूर्व शैलेश्वर सती प्रसाद ने कहा कि डॉ राजेंद्र प्रसाद बौद्ध धर्म से भी प्रभावित थे, इसलिए उन्होंने नवनालंदा का उद्धार करने की बात सोची। उन्होंने कहा कि राजेंद्र प्रसाद दार्शनिक के साथ साथ राष्ट्रीय चेतना भी थे। वह धार्मिक थे परंतु अंध धार्मिक नहीं थे। कुलपति ने कहा कि डा. राजेंद्र प्रसाद की प्रतिमा और डीन को नजरअंदाज किया गया है। महाविहार प्रत्येक साल 3 दिसंबर को उनकी जयंती मनाएगा। इस अवसर पर कई विश्वविद्यालय के छात्र मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन अध्यक्ष राजेश रंजन तथा मंच संचालन हिंदी विभागाध्यक्ष डाॅ. हरे कृष्ण तिवारी ने किया।

कार्यक्रम में शामिल पदाधिकारी।

खबरें और भी हैं...