जाॅर्ज ने अपने क्षेत्र के 35 किसानों को बिना पास के ही रक्षा मंत्रालय में दिया था प्रवेश

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 08:40 AM IST

Bihar Sharif News - सुजीत कुमार वर्मा | बिहारशरीफ वैश्विक मजदूर नेता की छवि और देश में रक्षा सहित कई मंत्रालयों की जिम्मेवारी...

Nalanda News - jarg had given 35 farmers of his area without any security at the defense ministry
सुजीत कुमार वर्मा | बिहारशरीफ

वैश्विक मजदूर नेता की छवि और देश में रक्षा सहित कई मंत्रालयों की जिम्मेवारी संभालने वाले जाॅर्ज फर्नांडीस एक सांसद के रूप में आज भी काफी लोकप्रिय हैं। सादगी और अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति उनके लगाव से जुड़ी कई बातें चर्चा में रहती हैं। बतौर सांसद कार्यकर्ताओं के लिए जिस तरह से जार्ज लोकप्रिय रहे वह मौजूदा सांसदों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण है। जार्ज के साथ हमेशा साये की तरह रहने वाले डाॅ. महेश प्रसाद सिंह ने उनसे जुड़ी कई बातों को साझा किया। बता दें कि जाॅर्ज कभी सुरक्षा साथ लेकर नहीं चलते थे। डाॅ. महेश उनके साथ हमेशा रहते थे। उनकी कड़क मूंछ और पहनावा ओढ़ावा के कारण लोग उन्हें ही जार्ज का बॉडीगार्ड समझ लेते थे।

क्षेत्र के कि सानों को कराया रक्षा मंत्रालय का भ्रमण : जार्ज फर्नांडीस जब रक्षा मंत्री थे उसी समय नालंदा के 35 किसानों को कृषि विभाग द्वारा भ्रमण के लिए दिल्ली भेजा गया था। विभाग द्वारा रहने की व्यवस्था की गयी थी। फिर भी जब ये लोग अपने सांसद से मिलने पहुंचे थे तो जाॅर्ज ने सभी को अपने आवास में ठहरा लिया। खाने-पीने की व्यवस्था की। किसानों ने बात ही बात में रक्षा मंत्रालय देखने की इच्छा जाहिर की। जिस पर जार्ज ने सभी को अगले दिन मंत्रालय दिखाने का वादा किया। डाॅ. महेश प्रसाद सिंह ने बताया कि अगले दिन जब किसान मंत्रालय के गेट पर पहुंचे तो बिना किसी पास के सिर्फ इनकी गिनती कर सभी को अंदर प्रवेश दे दिया गया। सभी के साथ जार्ज पूरी गर्मजोशी से घुमे। चाय-बिस्कुट से स्वागत कराया। कोई हवाई चप्पल में तो कोई चेहरे पर गमछा लपेटे था। कोई धोती पहने था तो कोई पायजामा और शर्ट। मंत्रालय का हर कर्मचारी और पदाधिकारी यह देखकर आश्चर्यचकित था कि खुद रक्षा मंत्री इनके साथ इतना घुल-मिलकर बातचीत कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि घुमने गये किसान मंत्रालय की चकाचौंध देखकर मंत्रमुग्ध थे। सभी को अपने कार्यालय में ले जाकर दिखाया और बोले कि देखो यही बैठते हैं।

हटवा दिया था लोहे का गेट : रक्षा मंत्री बनने के बाद इनकी सुरक्षा को लेकर आवास पर लोहे का गेट लगवाया गया था। जैसे ही इन्होंने इसे देखा तुरंत हटवाने का निर्देश दिया। पुराना लकड़ी का गेट ही लगा रहा और पहले की तरह ही उन्होंने इसे खुला रखने का निर्देश दिया ताकि किसी को मिलने-जुलने में परेशानी न हो। क्षेत्र से आने वाले कार्यकर्ता हों या आम लोग सभी से पहले की तरह मिलते-जुलते रहे। सुरक्षाकर्मी टेंट लगाकर कैम्पस में रह रहे थे। आने वाले लोगों से पूछताछ, रोकटोक करने लगे तो उन्हें भी हटवा दिया।

नीतीश के सिद्धांतों पर था अटूट विश्वास

नीतीश कुमार के सिद्धांतों पर उन्हें अटूट विश्वास था। उन्होंने कभी भी किसी की अनाप-शनाप पैरवी नीतीश कुमार से नहीं की। डा. महेश बताते हैं कि कोई उनके पास नीतीश कुमार से जुड़ा पैरवी लेकर जाता था तो वह साफ कह देते थे कि इस काम के लिए वह उनसे नीतीश से नहीं कहलवायें। क्योंकि वह स्ट्रीट है और गलत काम नहीं कर सकते। वह उलझन वाला मुद्दा नीतीश पर टाल देते थे। क्योंकि उन्हें विश्वास था कि कुछ भी हो जाये नीतीश गलत नहीं कर सकता। पैरवीकारों के सामने ही साफ कहते थे कि नीतीश कुमार लंदफंद नहीं कर सकते हैं।

खुद साफ करते थे अपने कपड़े

डा. महेश बताते हैं कि वह अपने कपड़े खुद साफ करते थे। एक बार मुंगेर डाकबंगला में ठहरने का मौका मिला था। ठंड होने के कारण जार्ज ने रात को गर्म पानी से स्नान किया था। खुद ही कपड़े साफ किया।

लोटा में ही डुबाकर खाया था केला

जार्ज खाने-पीने में भी काफी सामान्य थे। दूध केला काफी पसंद करते थे। रक्षा मंत्री रहते हुए एक बार वह नानंद गये थे। तत्कालीन मुखिया ने पीतल के लोटे में दूध लाया था। भीड़ के बीच ही वह लोटे में ही डुबा-डुबाकर केला खाने लगे।

वर्करों के लिए की थी मानदेय की बात : डाॅ. महेश बताते हैं कि पावापुरी में सम्मेलन के बाद वह जार्ज के साथ रांची जा रहे थे। साथ में दिग्विजय सिंह भी थे। रास्ते में जार्ज ने दिग्विजय को कहा कि नीतीश को समझायें कि समर्पित कार्यकर्ताओं को भी मानदेय देने की व्यवस्था करें। हालांकि पार्टी मोर्चे पर उनकी यह बात नहीं चली।

अपनी भाषा बोलने पर देते थे जोर

यदि कोई उनके सामने अंग्रेजी या खड़ी हिन्दी में बोलने की कोशिश करता और नहीं बोल पाता था तो वह उसे साफ कहते थे कि अपनी क्षेत्रीय भाषा में ही बोलो मैं समझ लूंगा।

कार्यकर्ता ही लड़ते थे चुनाव

कार्यकर्ता ही चुनाव लड़ते थे। चुनाव के समय क्षेत्र में काफी कम समय देते थे क्योंकि उन्हें पूरे देश में प्रचार करना होता था। याददाश्त इतनी इतनी मजबूत थी कि एक-दो बार मिलने के बाद ही कार्यकर्ताओं का नाम-पता याद कर लेते थे।

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