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2091 शवों का अंतिम संस्कार करने में निसार ने लगाई अपनी कमाई और वृद्धा पेंशन

दुनिया से कूच कर चुके लोगों के प्रति भी मुंगेर के निमतल्ला मोहल्ले के 84 वर्षीय निसार रखते हैं संवेदना।

रंजीत कुमार विद्यार्थी | Last Modified - Feb 16, 2018, 04:39 PM IST

2091 शवों का अंतिम संस्कार करने में निसार ने लगाई अपनी कमाई और वृद्धा पेंशन

मुंगेर (बिहार). आज भाग दौड़ भरी इस जीवन में यहां जिंदा लोगों के लिए समय नहीं है। वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो दुनिया से कूच कर चुके लोगों के प्रति संवेदनाएं रखते हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं निसार अहमद आसी। इनका जीवन अपने लिए नहीं, बल्कि मुर्दों के लिए समर्पित है। बेशक चौंकाने वाली बात है।


आम तौर पर लोग सड़क पर पड़ी किसी लावारिस लाश से मुंह मोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन मुंगेर शहर के निसार अहमद आसी ऐसा नहीं करते, बल्कि उन्होंने अपने आप को लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के काम में झोक रखा है। जीवन के अंतिम पायदान पर खड़े 84 वर्षीय निसार अहमद आसी शहर के निमतल्ला मोहल्ले मे घुघनी, पकौड़ी और चाय की दुकान चलाते हैं। कई सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़े हैं। लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने की प्रेरणा उन्हें अपने पिता मो. हाफिज अब्दुल मजिद से मिली।


12 जनवरी 1934 को एक सामान्य परिवार में पैदा होने वाले निसार अहमद आसी की मानें तो 1958 में अंजुमन मोफीदुल इस्लामनामा संस्था की स्थापना की। संस्था का उद्घाटन तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गुलाम सरवर ने किया था। 1967-68 में शहर के सूतूरखाना में एक समारोह में भोजन में जहर मिले होने के कारण चार लोग मौत हो गई थी। इन सभी का अंतिम संस्कार निसार ने ही किया था।

पूरबसराय में नेशनल उर्दू गर्ल्स कॉलेज भी बनवाया

निसार ने 1972 में पूरबसराय में नेशनल उर्दू गर्ल्स कॉलेज की स्थापना की। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गुलाम सरवर, पूर्व मंत्री रामदेव सिंह यादव एवं उपेंद्र प्रसाद वर्मा ने इस कार्य में मदद किया था। निसार ने औरंगजेब के बनाए गए जामा मस्जिद के एक कोने में एक बैठकखाना बना रखा है। उनके बैठक खाने में किसी और की नहीं, बल्कि लावारिस शवों की हजारों तस्वीर लगी है। एक शव के अंतिम संस्कार में दो से तीन हजार खर्च पड़ते हैं। निसार इस राशि का इंतजाम कुछ चंदा और वृद्धा पेंशन से मिलने वाली राशि से करते हैं।

बोले- जब तक जिंदा रहूंगा, अंतिम सांस तक लावारिस शवों की खिदमत करता रहूंगा

किसी की मौत पर आंसू बहाने और दुआ के लिए हाथ उठाने वाले निसार कहते हैं कि हमारे इंतकाल के बाद बच्चों की आंखों में आंसू इसलिए होंगे कि कुछ छोड़कर नहीं मरा। हमारी मैयत पर यार-दोस्त के दो बूंद आंसू भी मयस्सर नहीं होंगे। मगर जीवन के अंतिम सांस तक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करते रहेंगे।

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Web Title: 2091 shvon ka antim snskar karne mein nisaar ne lagayi apni kmaaee aur vriddhaa penshn
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