बापू ने कहा; रामकथा के मंचन, श्रवण से स्वाभाविक आनंद का होने लगता है प्रवाह

Buxar News - श्रीसीताराम विवाह महोत्सव के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर बाजार समिति के प्रांगण में चल रहे नव दिवसीय भव्य राम कथा...

Dec 01, 2019, 09:01 AM IST
Buxar News - bapu said hearing begins to flow from ramakatha to natural bliss
श्रीसीताराम विवाह महोत्सव के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर बाजार समिति के प्रांगण में चल रहे नव दिवसीय भव्य राम कथा के सातवें दिन पूज्य श्री मोरारी बापू ने अहिल्या प्रसंग की चर्चा की। कथा के प्रारंभ में मोरारी बापू ने कहा कि कथा जगत के सभी सूत्रों का संगम स्थल है। भगवत कथा में श्रवण, गायन, लीला दर्शन, भजन गायन से जिसे आनंद न मिले वह धरती का भार है। आश्रम चल रहे रामायण के कथा का प्रसंग दर्शन की बातें कर रहे थे। उन्होंने कहा कि फुलवारी में हिस्सा लेने वे भी गये थे। लेकिन नित्यकर्मों में विलंब न हो सके, इन कारणों से कुछ ही देर बाद चल दिये। उन्होंने आगे बताया कि भक्तमाली मामाजी महाराज के फुलवारी में हमारे सुकोमल राम को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट नहीं हुआ होगा। प्रथम दृष्टया वहां का दृश्य यहीं प्रस्तुत कर रहा था। थोड़े देर की ही दर्शन से ही मन प्रफुल्लित हो गया, आनंद से भर उठा। बापू ने कहा कि राम के कथा मंचन, श्रवण से अक्सर लोगों में आनंद का प्रवाह होने लगता है। यह स्वभाविक भी है।

कथा प्राणायाम का ही दूसरा रूप है : उन्होंने कहा कि कथा जगत के सभी सूत्रों का संगम व उद्गम स्थल है। ऐसी कथाओं से जो रस से सराबोर नहीं होता। वह इस धरती का भार है। सब पात्र अपनी जगह पर काया प्रवेश कर चुके थे। संगीत व उनके गायन भी अपने चरम था। मामा की पद रचनाओं का क्या कहना। उन्होंने कहा कि वैदेही वाटिका राम एकदम से निरूपम प्रतित हो रहे थे। कहा कि वे आनंद से अभिभूत हो गये। कथा प्राणायाम का ही दूसरा रूप है। लीला दर्शन, कथा श्रवण सब परायण है। यहीं सब कथा के सूत्र है। उन्हाेंने आश्रम में कथा प्रस्तुति करने वाले वहां तुलसी जयंती पर अपने गांव आने के लिए आमंत्रण भी दिया।

सभी सूत्रों का संगम स्थल है कथा, जिसको कथा में रस नहीं मिले वह इस धरती का भार है : बापू

शस्त्र से जीवात्मा का नहीं होता है नाश

जीवात्मा का नाश शस्त्र से नहीं होता, उसके शरीर का नाश होता है। बुद्धि नष्ट होने की स्थिति में आदमी का पतन होता है। अहल्या प्रकरण में भी नाश होने का मूल कारण बुद्धि का नष्ट होना ही है। आदमी का नाश बुद्धि नाश से होता है। इस बुद्धि को विकसित करने वाले संत मिल जाये तो नाश से आदमी बच जाता है। उन्होंने कहा इसलिये मनुष्य काे चाहिए कि अपने मन को परमात्मा के प्रति समर्पित कर दें। लेकिन मनुष्य स्वभाव से दुष्ट होता है। इसलिए किसी न किसी कारण उसमें अहंकार कुछ शेष रह जाता है। भगवान जब हमारे वृति, आवरण काे चुरा लेते हैं। हमारा मन देने के अहंकार से मुक्त हो जाता है। इसलिए ठाकुर जी को माखन चाेर, चित चोर, चिर चोर की संज्ञा से परिभाषित किया गया है। भगवान कहते हैं कि हम तुम्हें अहंकार मुक्त करने के लिए ऐसी चोरी किया करते हैं। अहंकार बहुत बड़ा दु:खद है। ज्ञान कई लोगों में होता है। अखंड ज्ञान नहीं होता। ज्ञान से मुक्ति मिलेगी, लेकिन परमात्मा की प्राप्ति प्रेम से होती है। ऐसा नास्तिकों का मानना है कि मृत्यु ही मोक्ष है। जिसने परम प्रेम किया उसे ईश्वर मिलता है।

क्षण-क्षण का मनुष्य को उपयोग करना चाहिए

पांच भाग में संपदा को बांट कर पहला भाग धर्म, दूसरा कृति, तीसरा अर्थ बढ़ाने में लगाओ। अपने सांसारिक कामनाओं की पूर्ति के लिए एक हिस्सा लगाओ तथा पांचवा स्वजनों के लिए लगाओ। ताकि उनकी आवश्यकताएं भी पूरी हो सके। उन्होंने आगे कहा कि यह संपदा मनीषियों के द्वारा समय को बताया गया है। इससे बड़ा कोई संपदा नहीं है। इसके हरेक पल का क्षण-क्षण का मनुष्य को उपयोग करना चाहिए। ताकि उसके सार्वभौमिक विकास में किसी तरह की कोई बाधा न आये। यह गीता का ज्ञान है। उन्होंने कहा कि गीता का एक-एक श्लाेक ग्रहण करने के बाद मनुष्य को किसी भी प्रकार के किसी क्लास की कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

श्रीराम कथा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु, श्रीराम के जयकारे से गूंजा इलाका

कथा श्रवण करते जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज

श्रीराम की एक झलक पाने को उमड़ा भक्तों का हुजूम

सिटी रिपोर्टर|बक्सर

सिय-पिय मिलन महोत्सव के तहत शनिवार को प्रभु श्रीराम की बारात निकली। इन सबके बीच में दशरथ पुत्रों की एक झलक पाने को बच्चे, बुढ़े, महिलाएं, युवतियां समेत युवा भी सड़कों पर दोपहर से इंतजाम कर रहे थे। सभी लोग प्रभु श्रीराम का आशीर्वाद लेने को आतुर थे। आयोजन स्थल से निकलकर बरात महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय परिसर स्थित जलमासे में पहुंची। जहां मंगल गीतों की गायन से माहौल रसमयी हो गया। जहां सद्गुरु पूज्य संत श्रीखाकी बाबा के मंदिर में आश्रम के महंत श्री राजाराम शरण दास जी महाराज ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ उनकी पूजा-अर्चना की। दूल्हे बने चारों राजकुमार समेत सभी लोगों की जमकर खातिरदारी हुई। रस्म को पूरा करने के बाद बरात शहर के विभिन्न सड़कों से होते हुए मामाजी की जन्म स्थली पांडेयपट्टी पहुंचा। मंगल गाली गाकर मिथिलावासियों ने भगवान श्रीराम समेत चारों भाईयों का भरपूर स्वागत किया। इन गीतों के माध्यम से भगवान के प्रति भक्ति की जो ससुराली रस धार बही उसकी अनुभूति मनोहर थी। मिथिलांचल के पारंपरिक मंगल गालियां सुनकर बाराती तथा संत व विद्वान भी भाव विभोर हो उठे।

समय की सार्थकता सत्संग में सबसे अधिक : उन्होंने बताया कि जितनी समय की सार्थकता सत्संग में उतना कहीं भी नहीं है। ये मेरा अपना अनुभव है। रामानुजाचार्य ने ब्रह्मसूत्र भाष्य करते हुए कहा कि पूरा जगत परमात्मा का शरीर है। जगत रूपी शरीर में परमात्मा स्वयं आत्मा है। वे इस शरीर में आनंद के रूप में, प्रेम के रूप में मिलते हैं। उन्होंने कहा कि कई धर्मों ने तो मौज करने से मना किया है। कई लोग कथा में तबला व गायन को मना किये हैं। हमारे गायन, वाद्य व नर्तन से प्रभु का अभिषेक होता है। त्याग व उदासिनता की बात करने वाले भी बंद कमरे में शीशे में चेहरा देख कर तिलक करता है। यही मौज है। यह मनुष्य का स्वभाव है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि धरती पर थोड़ी खरोच की खबर सूर्य तक जाती है। वैज्ञानिकों का यह कथन हमारे संयुक्त होने की पुष्टि करता है।

कथा के दौरान नाचते गाते श्रद्धालु।

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