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जलभरी के साथ वामनेश्वर नाथ मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा महापुराण के दशमस्कन्ध कथा का हुआ शुभारंभ

एक वर्ष पहले
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श्री वामनेश्वर नाथ मंदिर सेवा समिति के तत्वावधान में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण के दशमस्कन्ध कथा का शुभारंभ हुआ। इस क्रम में शुक्रवार को जलभरी यात्रा निकाली गई। जलभरी यात्रा वामन भगवान के मंदिर प्रांगण से निकली। यात्रा में केंद्रीय कारा के दक्षिणी द्वार से होते हुए महलचकिया, नई बाजार, मठिया मोड़, आईटीआई फील्ड, सोमेश्वर स्थान होते हुए केंद्रीय कारा में उत्तरी गेट के समाने सिपाही घाट पर महिलाएं सिर पर कलश लेकर पहुंची। जहां से वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धालु गंगा जल कलश में भरकर आयोजन स्थल पर पहुंचे। इस क्रम में सचिव विनय कुमार सिंह, उपसचिव धनंजय सिंह, कोषाध्यक्ष सत्येंद्र कुमार चौबे, मिथिलेश चौबे, श्याम बिहारी चौबे, शंकरदयाल राय समेत सैकड़ों की संख्या में पुरुष व महिला श्रद्धालु मौजूद रहीं। तत्पश्चात व्यासपीठ पर श्री मामाजी महाराज के कृपापात्र पं. नरहरि दास जी महाराज ने श्रीमद्भागवत महापुराण का रसपान कराया। जलभरी को लेकर कलश लेकर बड़ी संख्या में महिलाएं जुलूस में शामिल हुईं। भगवान के जयकारे से पूरा माहौल भक्तिमय हो गय है।

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव प्रसंग का पाठ किया


कथा के दौरान उन्होंने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव प्रसंग का पाठ किया। उन्होंने बताया कि श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम् स्कन्ध में भगवान श्री कृष्ण का जन्म होता है। जन्म के बाद ही कारागार में बंद वासुदेव जी भगवान को गोकुल के नंद बाबा के यहां छोड़ देते हैं। जहां से प्रभु अपने इस रूप में कई लीलाएं दिखाते हैं। कंस को जानकारी होने के बाद वह कान्हा को मारने के लिए सबसे पहले पूतना को भेजता है। लेकिन, कान्हा पूतना का उद्धार कर देते हैं। इस क्रम में उन्होंने गोकुल की सारी लीलाओं से अवगत कराया। इस क्रम में उन्होंने रास लीला का भी वर्णन किया। बताया कि रास लीला की भव्यता व अलौकिकता को देखने के लिए स्वर्ग के देव-देवता के अलावा भोलेनाथ भी कैलाश छोड़ गोकुल पधारते हैं। उन्होंने बताया कि भगवान के दशम स्कन्ध कथा के श्रवण मात्र से संपूर्ण श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा श्रवण करने के बराबर फल प्राप्त होता है।


मनुष्य को मानव शरीर भगवान की भक्ति के लिए मिला


महाराज ने कहा कि जहां सत्य, धर्म और हृदय की सरलता होती है, जहां पर भगवान श्रीकृष्ण रहते है और जहां कृष्ण रहते है वहीं निसंदेह विजय रहती है। श्री कृष्ण लीला से पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग का का संचालन किया करते है। भगवान कृष्ण प्रेम भाव में ही बसते है। श्री कृष्ण राजा भीष्मक और रूकमणि का प्रेम देखकर कुंडलपुर पधारें। सभी दुष्टों का अभिमान मिटाकर पूरी प्रजा को सुखी किया। भगवान की लीला आनंद देने वाली होती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को यह मानव शरीर मिला है, इसको भगवान की भक्ति में लगाना चाहिए ताकि इस भव सागर से पार उतरा जा सकें।


इसंान का सबसे बड़ा दुश्मन मन के अंदर ही है: महाराज


कोई भी जन्म से पापी नहीं होता। ‘इसके जवाब में यह भी कहा जाता है कि कोई भी जन्म से संत नहीं होता।’ भारत में पुरानी कहावत तो यह है कि साधु और नदी का अतीत जानने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।’ निहितार्थ यह है कि न तो साधु और न ही नदी का रास्ता पूरी तरह पवित्र होता है। हमारा जीवन लालच और कुचक्रों से भरा पड़ा है और हम जानते हैं कि आदम भी सेब के लालच में फंस गया था। हमारा मन जंगली घोड़े की तरह स्वच्छंद है। हमारा मन भी सच, न्याय, प्रेम की बजाय सुख, दुख और पैसे के आधार पर निर्णय लेने लगा है और कुचक्र में फंसता जाता है।

कलश यात्रा में शामिल श्रद्धालु।

जलभरी में बड़ी संख्या में कलश लेकर पहुंचे श्रद्धालु, भक्ति गीतों से भक्तिमय हुअा माहौल

कलश यात्रा में शामिल महिलाएं।
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