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आत्मदेव से कहते हैं गोकर्ण, भगवान की भक्ति ही है सर्वोत्तम : आचार्य नरहरि जी
नगर के अंतिम छोर जेल अहाते में विराजमान भगवान वामन मंदिर प्रांगण में मंदिर निर्माणार्थ चल रहे कथा के तीसरे दिन कथावाचक आचार्य नरहरी दास महाराज ने दशम स्कंद के महात्म्य को बहुत मार्मिकता के साथ भक्तों को समझाया। उन्होंने बताया कि यह स्कंद बहुत ही अद्भुत है। इसको दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। पहला भाग पूर्वाध जिसमें 49 अध्याय है तो दूसरा उत्तरार्ध है जिसे 41 अध्याय में देखा जा सकता है। पद्म पुराण की कथा छेड़ते हुए उन्होंने कहा कि आत्मदेवजी को जब धुंधकारी से अत्यंत कष्ट होने लगा तो तब वे बहुत निराश हो गये। इसी वक्त उनके पास गोकर्ण जी का आगमन हुआ। उन्होंने आत्मदेव जी की निराशा को समझ कर बड़ा ही सुंदर उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है। देह की मोह माया त्याग कर आप प्रभू की भक्ति में लग जावें। संसार में कुछ भी नहीं रखा है। केवल एक ब्रह्म ही सत्य है। इस उपदेश को सुनने के बाद आत्मदेवजी को वैराग्य हो गया। उसके बाद घर त्याग कर वन की ओर चल दिये। कथा के दौरान विनय कुमार सिंह, धनंजय सिंह, सत्येंद्र कुमार चौबे, मिथिलेश चौबे, श्याम बिहारी चौधरी, शंकरदयाल राय, सिद्धनाथ भगत, योगेन्द्र प्रसाद, श्याम जी यादव, विनोद सिंह यादव समेत अन्य श्रद्धालु श्रोता उपस्थित रहे।
कथा सुनते श्रद्धालु श्रोता गण।