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राजशाही परंपरा से हुआ महाराजा का दशकर्म, रंग का दस्तूर में पुरुष को दी पगड़ी और महिलाओं को साड़ी

Buxar News - डुमरांव के महाराजा बहादुर कमल सिंह के निधन के दसवें दिन शाही परंपरा के अनुसार ’रंग का दस्तुर’ कार्यक्रम संपन्न...

Jan 16, 2020, 07:20 AM IST
Dumranv News - maharaja39s rituals from the royal tradition the turban given to men in color and the saree to women
डुमरांव के महाराजा बहादुर कमल सिंह के निधन के दसवें दिन शाही परंपरा के अनुसार ’रंग का दस्तुर’ कार्यक्रम संपन्न किया गया। इस कार्यक्रम में राज परिवार के सभी परिजन व रिश्तेदार आए थे। परंपरा के तहत दशकर्म व मुंडन के बाद युवराज चंद्रविजय सिंह व उनके छोटे भाई मानविजय सिंह को पगड़ी बांधी गई। परिवार के अन्य पुरूष सदस्यों को भी उनके रिश्तेदार द्वारा पगड़ी भेंट की गई। यह पगड़ी जम्मू के ’अखनूर स्टेट’ के वारिश व महाराजा के छोटे पुत्र मान विजय सिंह के साले ठाकुर दुष्यंत सिंह जामवाल के द्वारा लाया गया था। मुंडन के बाद सबसे पहले महाराज के बड़े बेटे चंद्रविजय सिंह को पगड़ी बांधी गई। इसके बाद मानविजय सिंह को पगड़ी की रस्म अदायगी की गई। इस दौरान पूरा परिवार महाराजा को याद कर भावुक हो गया। परिजनों की सिसकियां से स्पष्ट हो गया था कि महाराजा बहादूर के जाने का गम इस परिवार पर अभी भी कम नहीं हुआ है। चंद्रविजय सिंह के बाद मानविजय सिंह, सुमेर विजय सिंह उर्फ बिट्टू बाबा, शिवांग विजय सिंह व समृद्ध विजय सिंह को अखनूर स्टेट की तरफ से पगड़ी भेंट की गई। इस दौरान महाराजा बहादुर कमल सिंह की बहन संगीता सिंह बासी, ममेरी बहन सह पूर्व प्रधानमंत्री बीपी सिंह की प|ी सीता सिंह, बेटी मृदुला कुमारी, कणिका सिंह, अरूणीमा सिंह, नतिनी रोहिणी, आकृति, राज सिंह, मोहन सिंह, राजेश राज, ऋषभ राज, उनके रिश्तेदार शिवेन्द्र सिंह डुंगरपुर, योगिता सिंह जामवाल आदि थे।

स्मृति शेष
रस्म अदायगी के बाद पूरा राज परिवार।

महाराजा के अधूरे ख्वाबों को पूरा करना हमारा धर्म : चंद्रविजय सिंह

महाराजा कमल सिंह ने डुमरांव के विकास के लिए बहुत कुछ किया है। उनके द्वारा स्थापित दर्जनों स्कूल, काॅलेज, अस्पताल व औद्योगिक इकाइयां उनके कार्यों का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वे आजीवन खेती व उद्योग धंधा को बढ़ावा देने में लगे रहे। उन्होंने डुमरांव के लिए जो ख्वाब देखे थे उसे पूरा करना एक पुत्र के रूप में हमारा धर्म है। उक्त बातें महाराजा बहादुर के बड़े पुत्र महाराज चंद्रविजय सिंह ने कही। उन्होंने कहा कि पिताजी के श्राद्धकर्म बीतने के बाद पूरा परिवार एकसाथ बैठ इस पर विचार करेगा कि कैसे पिताजी के छोड़े कार्यों को आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने कहा कि डुमरांव की जनता को उनसे जो लगाव था वह उनके कार्यों व सोंच के बदौलत था। आज कई परिवार उन पर आश्रित रहा है। उन्होंने कहा कि उनके कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए पूरा परिवार लालायित है।

रस्म अदायगी के बाद युवराज चंद्र विजय सिंह व मानविजय सिंह

महाराजा साहब की कृतियों को भुलाया नहीं जा सकता : मानविजय सिंह

महाराजा के द्वितीय पुत्र मान विजय सिंह ने कहा कि पिताजी ने जो कार्य किए है उतना करना तो संभव नहीं है। लेकिन, राज परिवार उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने की सोच रखता है। मान विजय सिंह ने कहा कि महाराजा साहब की जो कार्यपद्धति थी वह हम सभी के लिए अनुकरणीय है तथा उनके बताए सिद्धांतों पर चलने के लिए पूरा परिवार प्रेरित है।

क्या है रंग का दस्तूर कार्यक्रम

शाही परंपरा के अनुसार जब किसी महाराजा की मौत होती है तो दसवें दिन रंग का दस्तूर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इस दिन राज परिवार के किसी रिश्तेदार के द्वारा पगड़ी लाई जाती है तथा अपने हाथों बांधी जाती है। सामान्य तौर पर हमारे यहां श्राद्धकर्म के दिन पगड़ी बांधने की परंपरा निभाई जाती है। लेकिन शाही परंपरा के अनुसार यह रश्म दशकर्म के दिन ही निभाई जाती है। बुधवार को इस परंपरा के निर्वहन में पूरा राजपरिवार व उनके कई रिश्तेदार मौजूद थे।

राज परिवार के स्तंभ थे महाराजा बहादूर

महाराजा बहादुर कमल सिंह क निधन के बाद रंग का दस्तूर कार्यक्रम शामिल होने दिल्ली से आई पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की प|ी व कमल सिंह की ममेरी बहन सीता सिंह ने कहा कि महाराजा कमल सिंह आजीवन सादगी भरा जीवन व्यतीत करते थे। उन्हें राजसी ठाट-बांट व लजीज व्यंजन पसंद नहीं था। बल्कि खुद भी सादा भोजन करते थे और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते थे। वे जब भी वे दिल्ली जाते थे तो हमारे यहां आकर भोजन करते थे। वे भोजन में दाल-चावल व आलू की भुजिया खाना पसंद करते थे। उन्हें जब भी कोई नया व्यंजन खिलाया जाता था और पसंद आता था तो खुद रसोईया से उसे बनाने की विधि पूछते और अपने खानसामा से बात कराते थे। सीता सिंह ने कहा कि उनका जीवन हम सभी के लिए अनुकरणीय व अतुलनीय है।

पूर्व प्रधानमंत्री की प|ी सीता सिंह

हमेशा जमीन से जुड़े रहे महाराजा साहेब

महाराजा बहादूर की पुत्री मृदुला कुमारी उर्फ सुधा हुजूर ने कहा कि उनके पिताजी हमेशा जमीन से जुड़े रहना पसंद करते थे। राज परिवार का मुखिया होने व दो बार सांसद रहने का उन्हें थोड़ा सा भी भान नहीं था। बल्कि वे खुद सादगी भरा जीवन व्यतीत करते व पूरे परिवार को भी ऐसा करने को कहते थे। वे खुद अपने हाथ से खेती करते व कोठी से टेक्सटाइल व बड़ा बाग तक साइकिल से जाते थे। वे खेती को सबसे बड़ा काम मानते थे तथा हमेशा पर्यावरण संरक्षण के प्रति संजीदा रहते थे। मृदुला ने कहा कि वे बेटा व बेटी में फर्क नहीं रखते थे तथा मुझे बेटा की तरह ही मानते थे। बता दें कि महाराजा के बीमार होने पर दिल्ली में मृदुला के देखरेख में ही उनका इलाज होता था।

मृदुला कुमारी

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