अपनी भावों को सहजता से व्यक्त करने का सर्वोत्तम माध्यम है मातृभाषा : डाॅ. मुश्ताक

Darbhanga News - मानव की विकासात्मक प्रक्रिया में मातृभाषा का सर्वाधिक योगदान होता है। यह हमारी संस्कृति की वाहक तथा मानवीय...

Feb 22, 2020, 07:16 AM IST
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मानव की विकासात्मक प्रक्रिया में मातृभाषा का सर्वाधिक योगदान होता है। यह हमारी संस्कृति की वाहक तथा मानवीय मूल्यों की धारक होती है। मातृभाषा भावों को सहजता से व्यक्त करने का आधार स्तंभ है। हमारे हृदय की भावनाओं की भाषा होती है। भाषाविद ग्रियर्सन ने लिखा है कि भारत भाषाओं का अजायवखाना है। लेकिन, यहां किसी भी दो भाषाओं में संघर्ष नहीं है। सीएम कॉलेज के संस्कृत, हिंदी, मैथिली, उर्दू व अंग्रेजी विभाग की ओर से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर शुक्रवार को व्यक्तित्व विकास में मातृभाषा का अवदान विषयक संगोष्ठी सह पुस्तक प्रदर्शनी में प्रधानाचार्य डॉ. मुश्ताक अहमद ने ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि दुनिया के 7000 में से 5000 भाषाएं दम तोड़ रही हैं। जबकि, अपने देश में 1951 भाषाएं जीवित हैं। मातृभाषा की अहमियत छोड़ देने से संकट गहरा रहा है। हमें अपनी भाषा को बचाना होगा।

भाषण प्रतियोगिता में सफल प्रतिभागी पुरस्कृत

मौके पर आयोजित भाषण प्रतियोगिता में सफल विकास कुमार, अमर भारती, राजनाथ पंडित, शशिकांत सिंह यादव, गोविंद कुमार, राकेश कुमार, अमरजीत कुमार, माधुरी कुमारी, निवेदिता, दीपक साहनी, सुधांशु कुमार गुप्ता, खुशबू कुमारी, मनीष कुमार व विष्णुकांत राजू आदि को प्रमाण पत्र एवं मैडल प्रदान किया गया। साथ ही मैथिली,उर्दू ,हिंदी व संस्कृत आदि भाषाओं में लिखित अनेक पत्र-पत्रिकाएं तथा पुस्तकों आदि की प्रदर्शनी लगाई गई। हिंदी की प्राध्यापिका डाॅ. मीनाक्षी राणा के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो. रागिनी रंजन ने किया।

मातृभाषा से दूर होने पर खो सकते हैं पहचान : अब्दुल

उर्दू के प्राध्यापक अब्दुल हई ने कहा कि हमारे लिए मातृभाषा की महत्ता सर्वाधिक है। क्योंकि, इसे हम मां की दूध पीते हुए ही सीखते हैं। इसे सीखने के लिए हमें विशेष श्रम की जरूरत नहीं होती है। यदि हम अपनी मातृभाषा से दूर हो जाएंगे तो हम अपनी पहचान को खो देंगे। क्योंकि, हमारी पहचान मातृभाषा से होती है। इसको समझना बहुत आसान होता है।

मातृभाषा, मातृभूमि व माता से बढ़कर कोई दूसरा नहीं हो सकता : डाॅ. आरएन चौरसिया

संस्कृत विभागाध्यक्ष डाॅ. आरएन चौरसिया ने कहा कि मातृभाषा भाव को व्यक्त करने और समझने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन है। मातृभाषा, मातृभूमि व माता से बढ़कर कोई दूसरा नहीं हो सकता। मातृभाषा के महत्व को समझते हुए यूनेस्को ने प्रतिवर्ष 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की स्वीकृति दी थी। जिसका मुख्य उद्देश्य भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषावाद के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना है।

भारतीय भाषाओं में है मिठास : डाॅ. प्रीति त्रिपाठी

हिंदी विभागाध्यक्ष डाॅ. प्रीति त्रिपाठी ने कहा कि मातृभाषा के बल पर ही हम अपनी संस्कृति व समाज को बचा सकते हैं। हिंदी व उर्दू सहित भारतीय भाषाओं में मिठास होती है। हिंदी अनेक भाषाओं का समुच्चय है, जो एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। डाॅ. मशरूर सोगरा ने कहा कि उर्दू तहजीब व सलीका की भाषा है। अपनी मातृभाषा में ही व्यक्ति का संपूर्ण बौद्धिक विकास संभव है। मैथिली की प्राध्यापिका प्रो. अभिलाषा कुमारी ने कहा कि जिस भाषा को हम सहज भाव से बोलते व समझते हैं,वही हमारी मातृभाषा है। इसमें न तो अधिक श्रम की जरूरत है,न ही व्याकरण के नियमों का विशेष प्रयोग होता है।

सीएम कॉलेज में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते प्रधानाचार्य।

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