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‘हे माय जोगिया मोर जगत सुखदायक सुख सपनहु नहि भेल’ गीत पर झूम उठे दर्शक, देर रात तक गोते लगाते रहे लोग

Darbhanga News - त्रिदिवसीय मिथिला विभूति पर्व समारोह के तीसरे दिन मंगलवार की संध्या सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।...

Nov 13, 2019, 07:11 AM IST
त्रिदिवसीय मिथिला विभूति पर्व समारोह के तीसरे दिन मंगलवार की संध्या सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत मंगल ध्वनि व नटराज डांस एकेडमी के नृत्य और ममता ठाकुर के स्वर में मंगलाचरण मिथिला के धिया सिया जनक जननी भेली से हुई। उसके बाद आगत अतिथि सांसद गोपालजी ठाकुर, डॉ. अशोक यादव, पद्मश्री डॉ. सीपी ठाकुर, एमएलसी दिलीप चौधरी, डॉ. मदन मोहन झा, पूर्व कुलपति राज किशोर झा, विधायक संजय सरावगी, पूर्व एमएलसी विनोद चौधरी व मिश्री लाल यादव का स्वागत पाग- चादर व माला से किया गया। वहीं आगत अतिथियों के स्वागत में सुषमा झा ने पाहुन ऐला दुआरी हे स्वागत करू बहिना ने गाकर आगत अतिथियों का स्वागत किया। संस्थान के महासचिव डॉ.वैद्यनाथ चौधरी बैजू ने आगत अतिथियों का स्वागत करते हुए आयोजन में किसी तरह की कमी रहने के लिए क्षमा मांगते हुए सभी लोगों से सहयोग करने की अपील की। श्री बैजू ने कहा कि आयोजक की ओर से सभी मैथिल प्रेमी लोगों को आमंत्रित किया जाता है। लेकिन यदि किसी कारण भूलवश किन्हीं तक आमंत्रण नहीं पहुंचा तो वे मन में कष्ट न करें बल्कि वे इस कार्यक्रम में और बढ़ चढ़कर भाग लें।

नृत्य प्रस्तुत करती नटराज डांस एकेडमी के नृतक।

नृत्य प्रस्तुत करते सृष्टि फाउंडेशन के सदस्य।

सृष्टि फाउंडेशन के कलाकारों ने मिथिला विभूति पर्व में बांधा समां

तीन दिवसीय मिथिला विभूति पर्व समारोह के समापन समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। सृष्टि फाउंडेशन के कलाकारों ने ओडिसी नृत्य-नाटिका के माध्यम से लोगों के समक्ष गीता की प्रस्तुत की। नृत्य में भगवान श्रीकृष्ण की भूमिका में सृष्टि के संस्थापक गुरु जयप्रकाश पाठक, अर्जुन की भूमिका में नयन कुमार माझी, ब्रह्मा की भूमिका में सुबोध दास तथा सोनाधारी सिंह, स्वर्णम उपाध्याय, रुबी गुप्ता ,कोमल माझी, रितिका कुमारी ने अपनी प्रस्तुति से उपस्थित जनसमूह को भक्तिमय कर दिया। इसके बाद सृष्टि की ओर से अंकिता झा,रिसिका भारती, रुबी गुप्ता, कोमल माझी एवं स्वर्णम उपाध्याय ने मिथिलाचल के प्रसिद्ध लोक नृत्य झिझिया और सामा चकेवा से खचाखच भरे पंडाल को झूमा दिया। यहां तक कि दर्शक दीर्घा में दायीं ओर बैठी महिलाएं ने ताली से ही संगत देना शुरू कर दिया। नृत्य पर तालियों की संगत ने समां बांध दिया। अंतिम नृत्य के रूप में सामा की विदाई नृत्य “विहुली” की भाव विभोर प्रस्तुति हुई।

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