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अशोक प्रियदर्शी, नवादा. मणिपुर में तीन दिनों तक अध्यात्मिक होली मनाई जाती है। इसे याओसंग उत्सव मनाते हैं। इसी तरह ब्रज, गोकुल, मथुरा, बरसाने, अवध, मिथिला और मुंबइया होली मनाई जाती है। इसी तरह मगध में बुढ़वा होली मनाई जाती है। यह मुख्य होली के अगले दिन मनाया जाता है। मगध में गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, नवादा, शेखपुरा, नालंदा और जमुई इलाका में बुढ़वा होली का प्रचलन रहा है।
बुढ़वा होली के दिन सरकारी स्तर पर छुट्टी नहीं रहती फिर भी मगध में अघोषित तौर पर छुट्टी जैसी स्थिति रहती है। सरकारी और गैर सरकारी संस्थान बंद रहते हैं। सड़क, मुहल्ले और गलियों में लोग होली मनाते हैं।
वरीय नागरिक संघ के महासचिव महेंन्द्र प्रसाद सिंह कहते हैं कि यह होली बुजुर्गों के सम्मान की होली भी है। आम तौर पर बुजुर्गों की अनदेखी होती रही है। लेकिन बुढ़वा होली अकेला पर्व है जो बुजुर्गों के नाम से है। इसमें सभी लोग मिजजुलकर बनाते हैं। महिलाएं पुरूष, बुजुर्ग युवा और बच्चे सभी भागीदार होते हैं।
बुजुर्गों के सम्मान की अनूठी कहानी
मगध में बुढ़वा होली मनाए जाने के पीछे कई कहानी है। एक कहानी है कि मगध के एक राजा होली के दिन बीमार पड़ गए थे। वह जनप्रिय थे। लिहाजा, जनता ने भी होली नहीं मनाई। अगले दिन राजा को पता चला तो उन्होंने जनता के साथ होली खेला। लोग बताते हैं कि तभी से लोग होली के अगले दिन भी होली खेलने लगे। यह बुढ़वा होली कहलाया जाने लगा। धीरे धीरे यह व्यापक स्वरूप ले लिया।
बुढ़वा होली का रंग होता है गाढ़ा
देखें तो, मगध में जो लोग पहले दिन की होली नहीं खेलते, उन्हें बुढ़वा होली के दिन सराबोर होने से कोई नहीं रोक सकता। मुख्य होली के दिन आम तौर दोपहर के पहले कीचड़ और मिट्टी से खेलने की परंपरा रही है। समय की आपाधापी में जो लोग शाम की होली से बच जाते हैं। उन्हें बुढ़वा होली में बचना मुश्किल हो जाता है।
बुढ़वा होली के दिन होली गानेवालों (होलवइया) की टोली-जिसे झुमटा कहते हैं- अराध्य स्थलों से निकलकर कस्बे-टोले और मुहल्ले में होली गाते हुए गुजरता है। शुरुआत ढोलक, झाल, करताल, के धुनों के बीच अराध्य देव की सुमिरन (प्रार्थना) से होती हैं।
मगध में बुजुर्ग पर केन्द्रित कई गीत गाने भी हैं। भंग का रस होलवइया के उत्साह को दोगुना कर देता है। खास कि बुढ़वा होली के कपड़े भी बुढ़ापे की अवस्था जैसी होती है। होली के दिन रंगों से सरावोर कपड़े ही लोगों के शरीर पर चढ़े होते हैं। रंग का उत्साह पहले दिन से ज्यादा ही गहरा होता है।
शिवपुराण में भी है बुढ़वा होली का जिक्र
बुढ़वा होली की प्रासंगिकता शिव पुराण से भी मेल खाता है। वरिष्ठ साहित्यकार राम रतन प्रसाद सिंह रत्नाकर के मुताबिक, आदिकाल में होली के दिन भगवान विष्णु-महालक्ष्मी होली खेल रहे थे। तब नारद मुनि ने इसकी चर्चा भगवान शिव से की थी। भगवान शिव ने अपने प्रमुख गण वीरभद्र को बताया था कि मंगल का दिन हो और अभिजीत नक्षत्र हो, उस दिन वह होली खेलते हैं। विष्णुदेव पांडेय ने कहा कि पंचागों में भी ‘बुढ़वा मंगल’का जिक्र मिलता है। बदलते समय के साथ लोग मंगल दिन का इंतजार करने के बजाय होली के दूसरे दिन होली खेलने लगे।
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