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गयाधाम आए पहले पिंडदानी थे मंत्रेश्वर कामदेव, 24 मई 1240 को किया था पिंडदान

एक वर्ष पहले
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पिंडदान करते श्रद्धालु।
  • अभिलेख के अनुसार पहली बार 24 मई 1240 को प्रपितामहेश्वर में हुआ था पिंडदान
  • पिंडदान से संबंधित पहला अभिलेख 10वीं सदी का अक्षयवट से मिला है

गया (राजीव कुमार). अपने पूर्वजों को तर्पण व श्राद्ध की परंपरा काफी पुरानी है। आर्यों के आगमन के पहले इस परंपरा को देखा जा सकता है। लेकिन गया में मोक्ष के लिए पूर्वजों के पिंडदान की शुरूआत 10वीं सदी के बाद हुई। 1240 के मौजादिन कालीन प्रपितामहेश्वर मंदिर अभिलेख में पहली बार गया श्राद्ध परंपरा का उल्लेख है। यह अभिलेख दास वंश के मुईजुद्दीन बहराम के शासन काल का है। 
 
छह पंक्तियों के इस अभिलेख में पश्चिमोत्तर भारत के सोपथ परिवार के क्षत्रिय कुल के अजिहिल गोत्र के मंत्रेश्वर कामदेव द्वारा सपत्नी गया में गया-श्राद्ध करने का उल्लेख है। अभिलेख के अंतिम पंक्ति में कहा गया है कि गया में श्राद्ध करने से पितृ(पूर्वज)के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं व मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस अभिलेख में कामदेव के पूर्वजों अजयपाल, उत्तर व जगतपाल, जो क्रमश: पिता, दादा व परदादा थे, का भी उल्लेख है।
 

12वीं सदी से श्रद्धालुओं का आना शुरू 
पिंडदान से संबंधित पहला अभिलेख 10वीं सदी का अक्षयवट से मिला है। एक अन्य अभिलेख लक्ष्मणसेन के शक्तिपुर ग्रांट में गयावाल ब्राह्मण का उल्लेख मिलता है। पिंड दान का विस्तृत वर्णन गया महात्म्य में है, जो वायु पुराण का परिशिष्ट है। भाषा के आधार पर उसे 12-13वीं सदी का माना जाता है।
 

1508 में में चैतन्य महाप्रभु ने भी किया था पिंडदान
1508 में गया पहुंचकर चैतन्य महाप्रभु ने भी पिंड दान किया था। इससे पहले चीनी बौद्ध यात्री फाह्यान व ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में गया और बोधगया की धार्मिक स्थिति का उल्लेख किया है, लेकिन गया-श्राद्ध का उल्लेख नहीं किया है। पाल राजाओं के समय गया शैव धर्म का केंद्र भी बना। नौंवी सदी से गया का तीर्थ के रूप में महत्व स्थापित होने लगा और मंदिरों का भी निर्माण शुरू हुआ। वज्रपाणि के एक अभिलेख में गया शहर का विस्तार होने की सूचना है। इसके अलावा भी कई ग्रंथों में वर्णन है।
 

दशरथ के लिए सीता के पिंडदान करने का उल्लेख
हालांकि परंपरा में सीता द्वारा श्वसुर राजा दशरथ के पिंडदान करने का भी उल्लेख है। लेकिन इसका उल्लेख वाल्मिकी रामायण में नहीं है। इसका उल्लेख आनंद रामायण सहित रामायण के दूसरे अन्य संस्करणों में है। इसका समय 10वीं सदी के बाद का माना जाता है। 1242 ई. के प्रपितामहेश्वर मंदिर अभिलेख से पश्चिमोत्तर भारत से पूजा को श्रद्धालुओं के आगमन की सूचना है। 12वीं सदी के बाद से गया में श्रद्धालुओं के लगातार आने की सूचना मिलनी शुरू होती है। इसी समय गयासुर की पौराणिकता भी प्रचलन में आया।
 


 

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