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म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के...

एक वर्ष पहले
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फिल्म दंगल में आमिर खान के डॉयलाग ‘म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के...’ से प्रेरित होकर स्थानीय महिलाएं अपना भविष्य गढ़ रहीं हैं। कम उम्र में ही वे स्कूलों में बच्चों को पढ़ाकर खुद का खर्च निकाल रही हैं और अपने सपनों को उड़ान दे रही हैं। कहती हैं, खुली आंखों से सपना देखना और उन्हें हकीकत में बदलना ही उन सभी का लक्ष्य है। कुछ भी असंभव नहीं है, को वे प्रेरणा वाक्य मानती हैं। इन लड़कियों के जज्बे को देख कर भगवान बुद्ध का अप्प दीपो भव(अपना दीपक खुद बनो) सूत्रवाक्य याद आता है, जिसे इन लड़कियों ने चरितार्थ करने की कोशिश की है। खुद की आय से आत्मनिर्भरता व आत्मसंतुष्टि के अलावा वित्तीय प्रबंधन का गुर भी सीख रही हैं। कहती हैं, हमारी सफलता के बाद हमारे अभिभावक गर्व से कहेगें, ‘म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के...’।

पूनम कुमारी के पिता सत्येंद्र प्रजापत व मां तेतरी देवी मिट्टी का बर्तन बनाते हैं। पैसे के साथ पढ़ाई हो, इसलिए स्कूल में अध्यापन का काम शुरू किया। इससे काफी मदद मिलती है। विज्ञान में इंटेरेस्ट है और चिकित्सक बनना चाहती हैं। डॉक्टर बनने के लिए कड़ी मेहनत कर रहीं हैं।

ज्योति शर्मा कहती हैं, उनके पिता शिवपूजन शर्मा बस चालक हैं, मां संजू देवी गृहिणी के साथ सिलाई का काम करती हैं। उनका खुद का दुकान है। ज्योति कहती है, वह मेडिकल प्रोफेशन में जाना चाह रही हैं और नीट की परीक्षा दी हैं। आगे की भी तैयारी कर रही हैं। बच्चों को पढ़ाने से खुद का भी फाउंडेशन मजबूत होता है।


नीतू के पिता शत्रुघ्न प्रसाद किसान हैं और मां संजू देवी गृहिणी हैं। घर में पढ़ाई का माहौल नहीं होने के कारण स्कूल में बच्चों को पढ़ा रही हैं। इससे खुद का खर्च निकल रहा है, जिससे आगे की पढ़ाई संभव हो रही है। वह कॉलेज में लेक्चरर बनना चाहती हैं।


रजनी कुमारी के पिता विश्वेश्वर प्रसाद खेती करते हैं, जबकि मां सरोज देवी घर पर ही रहती हैं। वह एएनएम बनकर रोगियों की सेवा करना चाहती है। वह अपनी पढ़ाई का खर्च खुद निकालने के लिए स्कूल में पढ़ाती हैं। इससे पढ़ाने के क्रम में खुद की भी पढ़ाई का रीविजन होता है।
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