रमजान पर विशेष / सबसे बड़ी कुरान 1882 में हुआ था प्रिंट, गया के अलावा विश्व में मात्र दो जगह पर है

Dainik Bhaskar

May 27, 2019, 10:45 AM IST



1882 में छपे कुरान को दिखाते खानकाह के सज्जादानशीं। 1882 में छपे कुरान को दिखाते खानकाह के सज्जादानशीं।
X
1882 में छपे कुरान को दिखाते खानकाह के सज्जादानशीं।1882 में छपे कुरान को दिखाते खानकाह के सज्जादानशीं।

  • पहला ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन, दूसरा मौलाना आजाद लाइब्रेरी अलीगंज (लखनऊ) और तीसरा गया के खानकाह में
  • इस ग्रंथ में दो तफसीर (व्याख्या) और दो तर्जुमा (अनुवाद) के साथ है फारसी और उर्दू की जुबां 

गया (दीपक कुमार). कुरान इस्लाम के पवित्र ग्रंथ के साथ इसकी नींव है। मुस्लिम समुदाय की माने तो यह अल्लाह की भेजी सर्वोच्च ग्रंथ है। कई वर्षों पहले इसका अवतरण हुआ है। इसके अवतरण के बाद कुरान को अलग-अलग भाषा में अनुवाद कर प्रकाशित भी किया गया। मुस्लिम स्कॉलर के अनुसार सबसे बड़ी कुरान 1882 में प्रिंट किया गया था। 

 

आज इस प्रिंट की हुई कुरान को विश्व में मात्र तीन स्थानों पर सुरक्षित रखा गया है। पहला ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन, दूसरा मौलाना आजाद लाइब्रेरी अलीगंज उत्तरप्रदेश और तीसरा गया के नवागढ़ी स्थित खानकाह चिश्ती मोनमिया में। बता दें कि इस कुरान "तफसीरे हुसैनी व तफसीरे अजीजी' को शाह अब्दुल अजीज मोहद्दीस देहल्वी और शाह रफीउद्दीन मोहद्दीस देहलवी ने 1793 में हाथों से लिखा था। इसके 89 साल बाद इस ग्रंथ को पहली बार छापा गया, जो अपने साइज के लिए अनोखा है। जानकारी हो कि मदीना से माइग्रेट के दौरान खानकाह के पूर्वज इस ग्रंथ को अपने साथ लेकर गया पहुंचे थे। 

 

दो हिस्सों में 1152 पृष्ठों का है यह ग्रंथ
पहली बार प्रिंट हुए इस ग्रंथ के दो हिस्से हैं। 1152 पेज है। साइज की बात करें तो 35 सेंटीमीटर लंबा और 54 सेंटीमीटर चौड़ा है। खानकाह के लोगों की माने तो उस समय यह ग्रंथ लंबा-चौड़ा प्रिंट हुआ था। इसके बाद से इस साइज में अभी तक कुरान नहीं छापा गया है, साथ ही यह रेअर इस मायने में भी है कि इस ग्रंथ में दो तफसीर (व्याख्या) और दो तजुमा (अनुवाद) है।

 

कुरान के आखिरी में 30 पन्नों की एक अलग पुस्तक
कुरान के आखिरी पन्नों में एक और पुस्तक भी है। 30 पन्नों की इस पुस्तक का नाम "रिसाला फैजुर रहमान की अदाबुल कुरान' है। इसमें कुरान के अशरात और फवायद के बारे में दिया हुआ है। इसे गुलाम मोहम्मद गौस ने लिखा था, जो हजरत शाह अता हुसैन फानी के मुरीद थे।

 

खानकाह में धरोहर के रूप में रखी गई है यह ग्रंथ : चिश्ती
खानकांह के सज्जादानशीं सैयद शाह सबाहउद्दीन चिश्ती मोनमी ने कहा कि इस ग्रंथ को खानकाह में धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा गया है। कोई शब्द का मतलब अगर ढूंढना हो, या कुछ नई बातें बतानी हो तो इसे निकाला जाता है, साथ ही त्योहारों में इस ग्रंथ को लोगों के बीच लाया जाता है। उन्होंने बताया कि यह ग्रंथ अपने आकार के लिए अनोखा है। विश्व में तीन जगह पर यह उपलब्ध है। इस साइज का कुरान अबतक नहीं छापा गया है।

 

फारसी और उर्दू में की गई कुरान की व्याख्या
कुरान की व्याख्या (तफसीर) और अनुवाद (तर्जुमा) को फारसी और उर्दू में लिखा गया है। दो लोगों ने इस ग्रंथ को लिखा है। खानकाह के नाजिम अता फैसल ने बताया कि यह ग्रंथ इंडो-पाक का फस्ट ट्रांसलेशन है। अरबी से फारसी में इसे छापी गई। उन्होंने बताया कि अनुवाद का सिलसिला सबसे पहले हिन्दुस्तान में वलीउल्लाह मोहद्दीस देहलवी ने किया था।

COMMENT