जीवात्मा और परमात्मा का मिलन ही सच्ची साधना है :वेदान्ती जी महाराज

Gopalganj News - जीवात्मा और परमात्मा के मिलन ही सच्ची साधना है , उक्त बातें पंचदेवरी के बनकटिया में आयोजित वेष्णो महायज्ञ के...

Mar 22, 2020, 08:11 AM IST

जीवात्मा और परमात्मा के मिलन ही सच्ची साधना है , उक्त बातें पंचदेवरी के बनकटिया में आयोजित वेष्णो महायज्ञ के सातवें दिन शनिवार को अच्युतानन्द शास्त्री वेदान्ती जी महाराज ने कही । उन्होंने कहा कि संसार से निराश प्राणी जन्म जन्मान्तरों से सुख की आस में भटकता हुआ जब मानव तन में गोपियों की भांति देहाभिमान को त्यागकर साधन भजन करते हुवे ईश्वर को आत्मरूप से अनुभव करता है,तब जीवात्मा और परमात्मा के इस मिलन को ही महारास कहते हैं, रासलीला को स्त्री पुरूष का वासनामय आकर्षण नहीं समझना चाहिए ।

रुक्मिणी विवाह लीला की कथा प्रसंग को सुनाया


प्रवचन के दौरान वेदान्ती जी ने बताया कि रुक्मिणी विवाह लीला की कथा सुनाते हुए कहा कि द्वारकाधीश प्रभु के कौतुक पूर्ण जीवन चरित्र को सुनकर रुक्मणी जी का मन कृष्ण रङ्ग में रंग गया था,इस प्रकार जीवन भर कृष्ण प्रभु के दर्शन सेवा की इच्छा से ब्राह्मण देवता के हाथों अपनी शरणागती की सूचना द्वारिकाधीश प्रभु तक पहुंचाई, और प्रभु शिशुपालादि दुस्टों का मान मर्दन करते हुए रुक्मणी मैया का हरण कर द्वारका में विवाह लीला करते हैं, मैया रुक्मिणी की भांति जब साधक सन्त सद्गुरु के आश्रय में साधन भजन करते हुवे परमात्मा को पाना चाहता है, तब प्रभु अपने भक्त को समस्त सांसारिक बन्धनों से मुक्त करते हुवे रुक्मणी मैय्या की भांति अपनाकर सदा सर्वदा के लिए सनाथ कर देते है,कथा मण्डप में यज्ञ यजमान एवं विशाल श्रोतासमुदाय उपस्थित रहे। मोके पर आयोजन समिति के सदस्य स्थानीय मुखिया पुत्र मुन्ना यादव, हाकिम यादव, प्रभुनाथ सिंह , रमेश पांडेय, राजीव रंजन तिवारी , उपेन्द्र तिवारी सहित तमाम श्रद्धालु मौजूद थे ।

भक्तिमय जीवन जीना चाहिए


देहाभिमान एवं दुःख का प्रतीक कंस उद्धार का आध्यात्मिक भाव बताते हुए वेदांती जी ने कहा कि परमात्मा भक्तों को इस लीला के द्वारा यह भरोसा दिलाते हैं कि हरि ही सांसारिक दुखों एवं देहाभिमान रूप बन्धन का नाश कर सकते हैं, अतः मानव मात्र को प्रभु शरणागत हो भक्तिमय जीवन जीना चाहिए,कंस के आतंक से प्रजाजनों को भयमुक्त करते हुवे माता पिता गुरुजनों एवं अतिथियों की सेवा सम्मान करते हुवे वेदाज्ञा को अपने आचरण से प्रमाणित करते हैं”पितृदेवो भव मातृदेवो भव अतिथि देवोभव आचार्य देवोभव” सहज स्वास प्रश्वास रूप वेद की आज्ञा को मानना ही सनातन धर्मियों का सर्वोपरि कर्तव्य है ।


पंचदेवरी में हो रहे विष्णु महायज्ञ में प्रवचन सुनते श्रोता

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