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मन की दो गति आरोही से सृष्टि और अवरोही से होता है शरीर का नाश : संत गुरवानंद महराज

5 महीने पहले
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शहर से सटे बिठलपुर गांव के झखुआ मैदान में शनिवार को संत काग बाबा का 44वां वार्षिकोत्सव समारोह के पहले दिन योग साधना शुरू हुआ। इसके बाद संध्या में प्रवचन करते हुए उनके शिष्य गुरवानंद महाराज ने कहा कि मन की दो गति होती है आरोही व अवरोही, आरोही से सृष्टि का विस्तार होता है जबकि अवरोही से सृष्टि का नाश होता है।

मन जैसे जैसे नीचे उतरता है उसी गति से देवता से पशु व अंत में राक्षस बन जाता है। उसे कर्मानुसार फल भी भोगना पड़ता है। संत गुरवानंद महराज ने कहा कि अच्छे कर्मो के फल तो अच्छे होते हैं परन्तु तृप्ति नहीं होती है। बुरा फल कोई भोगना ही नहीं चाहता है। इसलिए अच्छे बुरे फल के भोग से निवृति हेतु फल रहित इच्छा से कर्म करने की जरूरत है। तभी आनंद की प्राप्ति संभव है। उन्होंने कहा कि संसार के विभिन्न विषयों के ज्ञान प्राप्ति का उद्देश्य भी आनंद ही है। परन्तु अधिकांश पदस्थापित छोटे बड़े व्यक्ति भी अपने मूल कर्तव्य सह हटकर मानसिक विकृतियों में रह कर न तो अपना कल्याण कर सकता है न ही संसार का।

संतों द्वारा प्रतिपादित ज्ञान का आरोही मन की गति का अंतिम पराकाष्ठा ज्ञान ही है। मनुष्य जैसे जैसे आरोही गति का प्राप्त होता है। वैसे-वैसे वृत्तियों के जाल से मुक्त होता जाता है। जब उन सभी वृत्तियों से मुक्ति मिल जाती है तो मनुष्य अपनी प्रकाशमय आत्मा में स्थित हो जाता है। फलस्वरूप जात पात नीच-ऊंच काले गोरे का भेद भाव मिट जाता है। केवल वसुधैव कुटुम्बकम की भावना रह जाती है। यही समत्व है जीवन है और आनंद है। योग विद्या का ज्ञान सभी वृत्तियों से उपर है यह गुरु से प्राप्त होता है जो सांसारिकता से मुक्त कर देता है। अन्यथा विद्वान, तथाकथित ज्ञानी, वैज्ञानिक भी अपने मन के जाल में फंस कर दुस्सह दुख में डूब जाते है। प्रवचन में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।

सत्संग में प्रवचन करते गुरवानन्द महाराज।

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