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सत्य, न्याय, भक्ति और विश्वास की विजय का प्रतीक है होली : डॉ. विवेकानंद

एक वर्ष पहले
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शहर के गंवई मोहल्ला के मूलनिवासी और ख्यातिलब्ध साहित्यकार डॉ. विवेकानंद तिवारी ने होली के विविध पक्षों की चर्चा करते हुए बताया कि होली का उल्लेख पुराणों, संस्कृत साहित्य दशकुमारचरित और कालिदास के साहित्य में मिलता है। होली का पावन त्यौहार एक प्राचीन भारतीय त्यौहार है। भारत देश के अलग अलग हिस्सों में होली के त्यौहार को अलग अलग नाम से पुकारा जाता है। उदाहरण के तौर पर होलिका पूजन, होलिका दहन, धुलेंडी, धुलिवन्दन, धुरखेल वसंतोत्सव आदि। होली का पर्व हर साल के फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली के त्यौहार में विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाएं होती है। होलिका का पूर्ण सामग्री सहित विधिवत् पूजन किया जाता है, अट्टहास, किलकारियां तथा मंत्रोच्चारण से पापात्मा राक्षसों का नाश हो जाता है। होलिका-दहन से सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं। वस्तुतः होली आनंदोल्लास का पर्व है। इस पर्व के विषय में सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा प्रह्लाद तथा होलिका के संबंध में भी है। नारदपुराण में बताया गया है कि हिरण्यकाश्यपु नामक राक्षस का पुत्र प्रह्लाद अनन्य हरि-भक्त था, जबकि स्वयं हिरण्यकाश्यपु नारायण को अपना परम-शत्रु मानता था। उसके राज्य में नारायण अथवा श्रीहरि नाम के उच्चारण पर भी कठोर दंड की व्यवस्था थी। अपने पुत्र को ही हरि-भक्त देखकर उसने कई बार चेतावनी दी, किंतु प्रह्लाद जैसा परम भक्त नित्य प्रभु-भक्ति में लीन रहता था। हारकर उसके पिता ने कई बार विभिन्न प्रकार के उपाय करके उसे मार डालना चाहा। किंतु, हर बार नारायण की कृपा से वह जीवित बच गया। हिरण्यकाश्यपु की बहिन होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। अतः वह अपने भतीजे प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश कर गई। किंतु प्रभु-कृपा से प्रह्लाद सकुशल जीवित निकल आया और होलिका जलकर भस्म हो गई। इस प्रकार होली का पर्व सत्य, न्याय, भक्ति और विश्वास की विजय तथा अन्याय, पाप तथा राक्षसी वृत्तियों के विनाश का भी प्रतीक है।

कहा - प्रकृति और मनुष्य के एकाकार का पर्व है होली, इसे देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है


डॉ. विवेकानंद

होलिका दहन के लिए की गई तैयारी।

बसंत के आगमन से सम्पूर्ण प्रकृति में नई चेतना का संचार होता है

होली और बसंत का अटूट रिश्ता है। बसंत के आगमन से सम्पूर्ण प्रकृति में नई चेतना का संचार होता है। होली का आगमन बसंत ऋतु की शुरुआत के करीब-करीब आस-पास होता है। यह वह वक्त है, जब शरद ऋतु को अलविदा कहा जाता है और उसका स्थान वसंत ऋतु ले लेती है। इन दिनों हल्की-हल्की बयारें चलने लगती हैं, जिसे लोक भाषा में फागुन चलने लगा है, ऐसा भी कह दिया जाता है। यह मौसमी बदलाव व्यक्ति-व्यक्ति के मन में सहज प्रसन्नता, स्फूर्ति पैदा करता है और साथ ही कुछ नया करने की तमन्ना के साथ-साथ समाज का हर सदस्य अपनी प्रसन्नता का इजहार होली उत्सव के माध्यम से प्रकट करता है। इससे सामाजिक समरसता के भाव भी बनते हैं।
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