आरटीआई से पूछा सवाल- मेरे दादा की जन्म-मृत्यु कब हुई

Kaimur News - यूं तो सूचना का अधिकार लोक प्राधिकार के कार्यों में पारदर्शिता के लिए हथियार बन गया है। यहां लोक सूचना के अधिकार...

Feb 21, 2020, 06:45 AM IST
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यूं तो सूचना का अधिकार लोक प्राधिकार के कार्यों में पारदर्शिता के लिए हथियार बन गया है। यहां लोक सूचना के अधिकार के तहत आए एक आवेदन से प्रखंड, अंचल समेत पुलिस थाने के कर्मी, पदाधिकारी सकते में आ गए हैं। आवेदक ने आरटीआई के जरिए भभुआ सदर बीडीओ से पूछा है - बताएं वर्ष 1956 में मेरे दादा की मृत्यु कब हुई थी? उनके जन्म की भी विवरणी भी उपलब्ध कराएं। जाहिर है यह सवाल महकमे में गले की हड्डी बन गया है। न उगलते बन रहा न निगलते बन रहा है। क्योंकि व्यवस्था के मुताबिक जन्म-मृत्यु का पंजीकरण सरकारी महकमे द्वारा ही किया जाता है। दरअसल भभुआ प्रखंड के मोकरी गांव के संजय सिंह ने भभुआ बीडीओ से लोक सूचना के अधिकार के तहत यह सवाल किया है। स्वघोषित तौर पर पूछा है कि उनके दादा चौधरी भगवती सिंह कि वर्ष 1956 में मृत्यु किस तिथि को हुई थी। इसके साथ ही उनकी जन्म तिथि की भी मांग की है। आवेदक का कहना है कि भगवती सिंह के पुत्र स्वर्गीय रामनिहोरा सिंह थे।

तब के अभिलेख भी अब मौजूद नहीं

सरकारी कर्मियों का मानना है कि इतने पुराने अभिलेख तो न अब पुलिस थानों में उपलब्ध है और न ही तब जन्म मृत्यु की पंजीकरण की कोई व्यवस्था थी।

विभागों से मांगी जा रही सूचनाएं इसके आधार पर दी जाएगी सूचना

इस संदर्भ में पूछे जाने पर प्रखंड विकास पदाधिकारी शशिकांत शर्मा ने कहा कि आवेदक संजय सिंह के द्वारा कथित तौर पर उनके दादा राम निहोरा सिंह के जन्म मृत्यु की सूचना मांगी गई है।

1952 अस्तित्व में आया था प्रखंड की अवधारणा

जानकारों का कहना है कि जन्म मृत्यु पंजीकरण सरकारी महकमे का प्रमुख कार्य है। हालांकि 1952 में प्रखंड की अवधारणा अस्तित्व में आया था। इसके बाद ही कई तरह के विभागों की गठन हुई। हाल की बात करें तो पोषक क्षेत्र के अंतर्गत हुई जन्म मृत्यु के पंजीकरण के लिए उप रजिस्ट्रार आंगनबाड़ी सेविकाओं को बनाया गया है। इन्हें 21 दिन तक के पंजीकरण का अधिकार हैं। इनके बाद पंचायत सचिव व क्रम से प्रखंड विकास पदाधिकारी को यह दायित्व दिया गया है। कहा यह भी जा रहा है कि इस व्यवस्था के गठन के पूर्व आजादी के ठीक बाद तक पुलिस थानों में संबंधित चौकीदार के रिपोर्ट पर जन्म मृत्यु की जानकारी रखी जाती थी।

तब जाने-माने क्षेत्र के जमींदार थे भगवती सिंह

आरटीआई के आवेदक व भगवती सिंह के स्वघोषित पोता संजय सिंह कहते हैं कि आजादी के बाद के दो दशकों तक मोकरी के भगवती सिंह व उनके पुत्र राम निहोरा सिंह जाने-माने व्यक्तित्व थे। वे जमींदार थे। उनके द्वारा 50 के दशक में वाराणसी के मणिकर्णिका घाट के डोम राजा को किसी के निधन पर दाह कर्म के बदले 100 गाड़ियों पर लदे खाद्यान्न दी गई थी। दावा कर रहे है कि मणिकर्णिका घाट से जुड़े लोग इसकी पुष्टि भी कर रहे हैं।

मांगे गए सवाल के सियासी मायने भी निकाले जाने लगे हैं

वैसे यह सवाल तो अजीबोगरीब लग रहा है। लेकिन इसके सियासी मायने भी निकाले जाने लगे हैं। बहरहाल आवेदक का दावा है कि वह लोक प्रशासन से यह जानकारी इसलिए चाहते हैं ताकि पैतृक संपत्ति में अधिकार का दावा कर सके। वहीं यह सवाल इसलिए भी सियासी दृष्टिकोण से भी चर्चा में आ गया है क्योंकि सत्ता और विपक्षी खेमे में सीएए, एनपीआर, एनसीआर पर खूब चर्चा है। यह सवाल आने के बाद तमाम सरकारी महकमे में भी सुगबुगाहट तेज हो गई है।

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