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बाहा पर्व को लेकर नाचते-झूमते रहे आदिवासी परिवार के लोग
हसनगंज प्रखंड के बलुआ पंचायत स्थित वार्ड पांच में आदिवासी समाज के लोगो ने श्रद्धा पूर्वक पारंपारिक परंपरा के साथ संथाल समुदाय ने बाहा पर्व मनाया। आदिवासी बाहुल्य गांवों में हिन्दुओं के प्रमुख त्योहार होली की तरह मनाये जा रहे बाहा पर्व को लेकर विशेष उमंग और उत्साह देखने को मिला। बाहा पर्व में आदिवासी समाज के लोग कोरे पानी से होली खेलते हैं। पर्व में साल वृक्ष के सखुआ, टिटभाट फूलों का विशेष महत्व होता है।
मुखिया कन्तलाल मुर्मू ने कहा की आदिवासी समाज के लिए बाहा पर्व को मुख्य माना गया है। इस को लेकर महिलाएं युवक युवतियां सामाजिक पारंपारिक सिंगार करती है। उन्होंने कहा कि गांव में इस तरह के पर्व से भाईचारे का माहौल बना रहता है। मौके पर पूर्व सरपंच भगवान हेम्ब्रम, उप सरपंच सुनीता किस्कू, संजय हेम्ब्रम, बालू लाल हेम्ब्रम, सुमन, संजय आदि गाँव के गणमान्य उपस्थित थे।
अलग-अलग तिथि में मनता है बाहा पर्व
पर्व के बारे में समिति प्रतिनिधि सदानन्द तिर्की ने बताया कि हिन्दुओं की होली के पहले अलग-अलग गांवों में अलग-अलग दिनों में बाहा पर्व का आयोजन किया जाता है। पर्व के दौरान सामूहिक रूप से जाहेर थान में इष्ट देव की पूजा पारंपरिक विधि विधान के साथ की जाती है। पूजा के दौरान विशेष तौर पर खिचड़ी बनायी जाती है जिसे प्रसाद के तौर पर पूरे गांव के लोग ग्रहण करते हैं। इसके बाद आदिवासी महिलाएं सजधज कर ढोल, मृदंग और नगाड़ा के गीत संगीत पर सामूहिक नृत्य करते हुए पूजास्थल की परिक्रमा करते है। फिर नायकी की अगुवाई में आदिवासियों का समूह नृत्य करते हुए पूरे गांव का भ्रमण करता है। इस दौरान नायकी प्रत्येक घर के दरवाजे पर खड़े होकर गृहस्वामी को साल का फूल देता है। बदले में गृहस्वामी आगंतुक लोगों के समूह के साथ कोरे सादे पानी से होली खेलते हैं। त्योहार के दिन करीब पूरे गांव के लोग सामुहिक रूप से त्योहार का आंनद परस्पर बांटते है।
बाहा पर्व में ढोल-नगाड़े बजाते आदिवासी समाज के सदस्य।