बाजार की कमी के कारण आर्थिक तंगी से जूझ रहे पान के किसान
किसानों की समस्या पर सरकार जितनी सफाई दे, जमीनी हकीकत कुछ और है। किसानों की समस्याओं के प्रति सरकार की उपेक्षा और प्राकृतिक आपदा से त्रस्त किसान आर्थिक तंगी झेल रहे हैं। आर्थिक तंगी के कारण किसान कर्जदारों की खरी-खोटी सुनने को अभिशप्त हो गए हैं। उक्त समस्याओं की मार झेल रहे मलपा गांव के पान की खेती करने वाले किसान बेहाल हैं। तीन दशक पूर्व मालपा गांव पान की खेती के लिए जाना जाता था। गांव के चौरसिया जाति के लोग पान की खेती के लिए कुशल माने जाते थे। तीन दशक पूर्व यहां लगभग 50 एकड़ में पान की खेती होती थी। अनुकूल परिस्थितियों के कारण किसान पान की खेती से अच्छी कमाई कर लेते थे। मलपा का पान बिहार के अन्य जिलों सहित दूसरे राज्यों में भी जाता था। लेकिन वर्तमान में यहां के पान के किसानों की स्थिति दयनीय है। एक तो उनके लिए बाजार सीमित हो गया है वहीं सरकारी सहायता के अभाव में उनकी हालत खस्ता हो गई है। बढ़ती मजदूरी, खल्ली के खाद, खरही आदि उपयोगी समानों की बढ़ती कीमत एवं अतिवृष्टि, सुखाड़ व ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदा की मार से त्रस्त किसान अब 8 से 10 एकड़ में ही पान की खेती कर रहे हैं। जबकि तीन दशक पहले इस गांव में 50 एकड़ में पान की खेती होती थी।
तीन दशक पूर्व मालपा गांव आकर पान व्यापारी पान ले जाते थे। व्यापारी के आने से किसानों को अच्छी कीमत मिल जाती थी। अब किसानों को खुद पान लेकर मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, बनमनखी, सौरबाजार, सोनवर्षा राज, खगड़िया, महेशखूंट के बाजार में कम कीमत पर पान बेचना पड़ता है।
सरकारी सहायता नदारद
किसान जयकांत चौरसिया, उमेश कुमार, सुरेश चौरसिया, सिकंदर चौरसिया, पंकज चौरसिया, सुनील चौरसिया बताते हैं कि पान की खेती के लिए कृषि विभाग से न कोई प्रशिक्षण न कोई सहायता दी जा रही है। यहां तक बैंक भी किसानों को ऋण देने से कतराते हैं।