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किसानाें के लिए कैश क्राॅप बना मक्के की खेती, गेहूं की फसल से हाे रहा है मोहभंग

एक वर्ष पहले
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मक्के की खेती यहां के किसानां के लिए कैश क्राॅप बन गया अाैर किसानों को खूब भा रहा है। कम लागत, अपेक्षाकृत बेहतर बाजार मूल्य और सबसे बड़ी बात हर मौसम में बेहतर उत्पादन ने मक्के की फसल काे सिरमौर बना दिया है। यहीं कारण है कि जूट की खेती के बाद गेंहूं की खेती से विमुख हुए जिले के किसान बड़े पैमाने पर मक्के का उत्पादन कर रहे हैं। रिकार्ड उत्पादन का ही नतीजा है कि निजी तौर पर ही सही कुछ प्राइवेट फर्म यहां मक्का प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करने की सोच रहे हैं तो कुछ ने स्थापित भी कर दिए हैं। ठाकुरगंज के गलगलिया में स्थापित स्टार्च फैक्ट्री इसका उदाहरण है। किसानों को उनकी उपज का और बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद और बढ़ी है। कृषि विभाग के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। चालू वर्ष 2020 में ही विभाग ने 10 हजार हेक्टेयर में मक्का बुवाई का लक्ष्य रखा था, जो वर्तमान में 29 हजार हेक्टेयर से अधिक हो चुका है। कई जगहों पर बुवाई जारी है एवं इसके तीन सौ प्रतिशत से अधिक होने की उम्मीद हो गई है। गेंहूं में मामला इसके ठीक उलट है। गेहूं के लिए विभाग ने 22 हजार हेक्टेयर में बुवाई का लक्ष्य निर्धारित किया था जो अब तक महज 11 हजार 370 हेक्टेयर के करीब पहुंचा है। यह लक्ष्य का महज 52 फीसदी है।

निर्धारित लक्ष्य 22 हजार हेक्टेयर की जगह 11 हजार 370 हेक्टेयर में हुई गेहूं की बुअाई

माॅनसून अाैर मौसम की अनिश्चितता प्रमुख कारण

जानकार बताते हैं कि मौसम की अनिश्चितता भी गेहूं से मोहभंग का बड़ा कारण है। जिला कृषि पदाधिकारी संतलाल प्रसाद साह भी स्वीकार करते हैं कि किशनगंज में कभी भी बारिश हो जाती है, जिससे गेहूं की फसल पर बुरा असर पड़ता है। फसलों में दाने आ जाने पर बारिश हो जाने से इसके फलन पर असर पड़ता है वहीं दाना पक जाने के बाद बारिश हो जाए तो दाने काले हो जाने का खतरा बन जाता है। ऐसा होता रहा है इस कारण भी किसानों का गेहूं की खेती से मोहभंग हो जाता है।

किसानाें काे कम लागत में अधिक उपज

मक्का उत्पादक किसानों व जानकारों ने बताया कि मक्के की खेती में गेंहूं की तुलना में लागत कम होती है। खेत तैयार करने से लेकर फसल के कटाई तक। इसके अलावे इसका बाजार मूल्य भी गेंहूं की तुलना में अपेक्षाकृत अच्छा रहता है। यहां की जलवायु में मक्के की फसल भी अच्छी होती है एवं अचानक हुई बारिश का भी इसपर गेंहूं की तुलना में कम असर पड़ता है। यहीं कारण है कि विगत चार वर्षों से गेंहूं की खेती जहां जिले में लक्ष्य से लगातार कम हो रही है वहीं मक्के की खेती का रकबा लगातार बढ़ता जा रहा है।

किशनगंज के दिघलबैंक प्रखंड में लगी गेंहू की फसल।

असमय बारिश से गेहूं की खेती पर प्रतिकूल असर

जिले में गेहूं की खेती घट रही है, जबकि मक्के की खेती की ओर किसानों का रुझान बढ़ रहा है। इसका पहला बड़ा कारण मौसम है। असमय बारिश के कारण गेहूं की खेती पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इसके अलावे खेती में कम लागत और उचित बाजार मूल्य मिलने के कारण कैश क्रॉप के तौर पर मक्का किसानों को आकर्षित करता है।
संतलाल प्रसाद साह,


जिला कृषि पदाधिकारी
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