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होलिका दहन पर खत्म होती जा रही है वर्षों पुरानी परंपरा

एक वर्ष पहले
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होलिका दहन के लिए जलावन के अलावे फुलौड़ी मांगने की परंपरा रही है

सांस्कृतिक रूप से मनाए जाने वाले होली में हंसी ठिठोली के बीच गाए जाने वाले फगुआ में श्रृंगार रस के साथ वीर रस की प्रधानता रही है। सामाजिक एकता और सौहाद्रपूर्ण वातावरण में होली मनाने की तैयारी शुरू कर दी गई है। होली में मात्र एक दिन बचे हैं। हर गांव में होलिका दहन के लिए अलग स्थान होता है। वैसे बसंत के आगमन के साथ ही होली की तैयारी और फाग गायन शुरु हो जाता है। लेकिन होलिका दहन के दिन धूल भरी होली और दूसरे दिन रंग खेलने की परंपरा समाज में आपसी सौहार्द और एकता घोल देती है। होलिका दहन के लिए जलावन के अलावे फुलौड़ी व पकौड़ी मांगने की परंपरा रही है। जलावन मांगने के वक्त आदरसूचक शब्द का इस्तेमाल किया जाता था। अगजा दे भाई कगजा दे, नय देवा तो दूगो गोइठा दा जैसे आत्मीयता भरी बोल अब कहीं नहीं सुनाई पड़ रही है। होलिका दहन के लिए अब लोग अपनी इच्छा से दहन वाले स्थान पर जलावन की सामग्री रख देते हैं या तो किसी के घर के बाहर रखा लकड़ी, उपस्कर, कागज का बंडल होलिका दहन में डाल देते हैं। गोईठा मांगे जाने की परंपरा के पीछे लोग सामाजिक रिश्तों को जोड़कर देखते थे। होली युवा एवं सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सौहार्द को निभाने वाला सबसे बड़ा पर्व है।

अबीर गुलाल लगाकर सेल्फी लेतीं युवती।
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