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मिथिला का लोक पर्व सप्ता व विपता व्रत कथा आरंभ, महिलाएं वैशाख शुक्लपक्ष के आखिरी रविवार तक बांधे रहती हैं डोरा
मंगलवार को जहां एक ओर लोग होली खेलने में व्यस्त थे। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण महिला सपता व विपता की पूजा की तैयारी में लगी हुई थी। सप्ता व विपता व्रत कथा चैत्र कृष्ण परीव तिथि से आरंभ होकर वैशाख शुक्लपक्ष के आखिरी रविवार को इसका विधित समापन होता है। इस कथा को महिलाएं प्रत्येक रविवार को स्नान करने के बाद नये वस्त्र धारण कर किसी ऐसे लोगों के यहां पहुंचती है जो इसे व्रत को पूरी विधि विधान के साथ करते व इस व्रत की कथा सुनाते है। व्रती महिलाएं कथा के जानकार महिला के यहां पहुंचकर कथा को सुनते है। इस कथा को महिला अपने नाखून के सहयोग से धान में से चावल निकालकर व दुईभ हाथों मे लेकर सुनती है।
इस कथा की अगर बात करें तो इसमें कहा गया है कि प्राचीन समय की बात है एक राजा थे जिनका नाम नल था व उनकी प|ी जिनका नाम दमयंती था। राजा का एक पुत्र जिसका नाम रोहित था। राजा की पुरी प्रजा खुशहाल थी किसी को किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी। एक दिन उसके यहां एक ब्रह्मणी आई और वह सपता डोरा बेच रही थी। रानी की दासी आई और उन्होंने सारी बात रानी को बताते हुए बोली की रोहित का एक और भाई हो इसके लिए इस व्रत को करें। रानी ने उनकी बात मान ली और डोरा खरीद लिया। सपता की पूजा होने के बाद उस डोरा को गले में डाल लिया। कुछ दिन बाद राजा की नजर रानी के गले में लटकती डोरा पर गया। उसने रानी से कहा की सोने की माला पहनती नहीं हो और धागे गले में पहन ली हो और धागे को ताेर दिया।
यह देखकर सपता को गुस्सा आया और वह सारी बात अपनी बहन विपता को बताया। विपता यह सुनते ही बोली राजा को धन का घमंड है इसलिए तुम्हारा अपना किया है। मै उसे सबक सिखा दूंगा। इसके बाद से ही राजा की स्थिति दयनीय होने लगती है और एक समय ऐसा आता है जो राजा लोगों को काम दिया करते थे राज महल में भुखमरी के कारण खूद दूसरे के राजा के यहां जाकर नौकर का काम करना पड़ा। कथा के अंत में उन्हें यह एहसास होता है कि हमारी एक गलती ही हमारे हुए दुर्दशा का कारण है। और फिर आत्मग्लानि महसूस होती है फिर सपता माता के कृपा से ही पून: स्थिति में सुधार होती है। इसलिए इस कथा का काफी महत्व है। खासकर वह नाड़ी जिन्हें संतान नहीं है या एक संतान है और दूसरा की अभिलाषा है उन्हें यह कथा जरूर सुनना चाहिए। ऐसे इस कथा को सुनने वाले के घरों में अन्न, धन, वैभव व कृति आदि का वास सदैव रहता है।
सप्त डाेरा बंधन की कथा सुनती व्रती।