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मनुष्य के जीवन का विकास आध्यात्मिक प्रगति से ही संभव, मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक वस्तु अविनाशी

Madhubani News - शहर के भाैअाड़ा राम चाैक पुलिस लाइन काली मंदिर परिसर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह ज्ञान महायज्ञ के...

Bhaskar News Network

Nov 11, 2019, 08:20 AM IST
Madhubani News - the development of human life is possible only through spiritual progress the spiritual object in human life is indestructible
शहर के भाैअाड़ा राम चाैक पुलिस लाइन काली मंदिर परिसर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह ज्ञान महायज्ञ के तीसरे दिन रविवार को वृदावन से आए विद्धान पंडित आचार्य नित्यानंद दास महाराज ने श्रीकृष्ण के लीलओं पर आधारित कथा का वर्णन करते हुए मनुष्य को अपने जीवन को सार्थक करने का मार्ग बताए। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ के माध्यम से नित्यानंद महाराज ने लोगों को बताया कि मनुष्य के जीवन का सर्वांगिन विकास केवल आध्यात्मिक प्रगति से ही संभव है। अगर कोई भौतिक विकास कर लिया लेकिन उसका आध्यात्मिक उन्नति नहीं हुई तो वह दुर्गुणों का शिकार हो जाता है और उस मनुष्य का पतन हो जाता है। मनुष्य के जीवन में भौतिक वस्तु नाशवान है लेकिन आध्यात्मिक वस्तु अविनाशी है। वह ध्रुव है और शाश्वत है।

भगवान ध्रुव के जीवन कथा को सुन भाव विभोर हुए श्रोता | श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ के माध्यम से आचार्य नित्यानंद दास महाराज ने भगवान ध्रुव के जीवन की गाथा बताई। जिसमें उन्होंने कहा कि मनु महाराज के दो पुत्र व तीन कन्या हुई। तीन कन्या के नाम आकृति, देवहुति व प्रसुति व पुत्र प्रियवत व उत्तानपाद। प्रियवत का चरित्र श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध में वर्णन किया गया है। यहा उत्तानपाद राजा के चरित्र का वर्णन किया। उतपाद राजा की दो प|ी है। पहली प|ी का नाम हैसुनीति और दूसरी प|ी का नाम सुरूचि। राजा उत्तानपाद को पहली प|ी प्रिय नही लगती थी व दूसरी प|ी के साथ एक समय राजा उत्तानपाद दूसरी प|ी के साथ सिंहासन पर बैठे थे। उसी समय उसी समय सुनीति के पुत्र ध्रुव व सुरुचि के पुत्र उत्तम खेल रहें थे अचानक उत्तम पिता के गोद में बैठ गए। लेकिन जब ध्रुव जी पिता के गोद में बैठने गए तो उसकी दूसरी मां न उसे डाट दिया। जिसके बाद वह वहां से चले गए और माता पिता को छोड़ अपने परमपिता नारायण के गोद में बैठ गए और केवल पांच वर्ष के अवस्था में ही घर छोड़ कर नारायण के ध्यान में चले गए। जिसके बाद उसे नारद दी ने उन्हें गुरू दिक्षा देकर वृदावन पधारें व मात्र छ:ह महिना में ही भगवान की प्राप्ती किए। इसी कारण हमेंशा भागवत के माध्यम से हमेशा अपने परम पिता के ध्यान में रहना चाहिए ताकि जीवन के बाद मोक्ष मिल सकें।

भागवत के माध्यम से हमेशा अपने परम पिता के ध्यान में रहना चाहिए ताकि जीवन के बाद मोक्ष मिल सके

श्रीकृष्ण के ध्यान में लीन आचार्य नित्यानंद दास महाराज व मंच पर उपस्थित लोग। कथा वाचन करते स्वामी श्री सुखदेव जी महाराज।

भास्कर न्यूज| मधुबनी

शहर के भाैअाड़ा राम चाैक पुलिस लाइन काली मंदिर परिसर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह ज्ञान महायज्ञ के तीसरे दिन रविवार को वृदावन से आए विद्धान पंडित आचार्य नित्यानंद दास महाराज ने श्रीकृष्ण के लीलओं पर आधारित कथा का वर्णन करते हुए मनुष्य को अपने जीवन को सार्थक करने का मार्ग बताए। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ के माध्यम से नित्यानंद महाराज ने लोगों को बताया कि मनुष्य के जीवन का सर्वांगिन विकास केवल आध्यात्मिक प्रगति से ही संभव है। अगर कोई भौतिक विकास कर लिया लेकिन उसका आध्यात्मिक उन्नति नहीं हुई तो वह दुर्गुणों का शिकार हो जाता है और उस मनुष्य का पतन हो जाता है। मनुष्य के जीवन में भौतिक वस्तु नाशवान है लेकिन आध्यात्मिक वस्तु अविनाशी है। वह ध्रुव है और शाश्वत है।

भगवान ध्रुव के जीवन कथा को सुन भाव विभोर हुए श्रोता | श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ के माध्यम से आचार्य नित्यानंद दास महाराज ने भगवान ध्रुव के जीवन की गाथा बताई। जिसमें उन्होंने कहा कि मनु महाराज के दो पुत्र व तीन कन्या हुई। तीन कन्या के नाम आकृति, देवहुति व प्रसुति व पुत्र प्रियवत व उत्तानपाद। प्रियवत का चरित्र श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध में वर्णन किया गया है। यहा उत्तानपाद राजा के चरित्र का वर्णन किया। उतपाद राजा की दो प|ी है। पहली प|ी का नाम हैसुनीति और दूसरी प|ी का नाम सुरूचि। राजा उत्तानपाद को पहली प|ी प्रिय नही लगती थी व दूसरी प|ी के साथ एक समय राजा उत्तानपाद दूसरी प|ी के साथ सिंहासन पर बैठे थे। उसी समय उसी समय सुनीति के पुत्र ध्रुव व सुरुचि के पुत्र उत्तम खेल रहें थे अचानक उत्तम पिता के गोद में बैठ गए। लेकिन जब ध्रुव जी पिता के गोद में बैठने गए तो उसकी दूसरी मां न उसे डाट दिया। जिसके बाद वह वहां से चले गए और माता पिता को छोड़ अपने परमपिता नारायण के गोद में बैठ गए और केवल पांच वर्ष के अवस्था में ही घर छोड़ कर नारायण के ध्यान में चले गए। जिसके बाद उसे नारद दी ने उन्हें गुरू दिक्षा देकर वृदावन पधारें व मात्र छ:ह महिना में ही भगवान की प्राप्ती किए। इसी कारण हमेंशा भागवत के माध्यम से हमेशा अपने परम पिता के ध्यान में रहना चाहिए ताकि जीवन के बाद मोक्ष मिल सकें।

श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के आखिरी दिन श्रीकृष्ण सुदामा चरित्र का वर्णन सुन भावुक हुए श्रोता

भास्कर न्यूज|बासोपट्टी/कलुआही

रविवार को सातवें व आखरी दिन राढ़ गांव नगर डीहवार ब्रह्म बाबा स्थान प्रांगण में आयोजित सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ कार्यक्रम में महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी श्री सुखदेव जी महाराज ने कथा के अंतिम दिन सुदामा चरित्र का प्रसंग श्रद्धालुओं को सुनाया। सुदामा चरित्र का वर्णन सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। कथा सुनाते वक्त आचार्य ने बताया कि भागवत कथा ही ऐसी कथा है, जिसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है। भगवान श्रीकृष्ण के सामान कोई सहनशील नही है। क्रोध हमेशा मनुष्य के लिए कष्टकारी होता है। इसके साथ कथा के अंतिम दिन श्री कृष्ण लीला में श्री कृष्ण का जन्म, बाल कथा, मधुवन में गोपियों के साथ रास-लीला उसके बाद कंश वध आदि गाथाओं का वर्णन हुआ। कथा में मन-मुग्ध होकर पुरुष महिला मंडल ने नृत्य भी किया। कथा में सुदामा कृष्ण चरित्र का वृतांत वर्णन किया गया जिसे सुन श्रोता भाव विभोर हो गए। कृष्ण-सुदामा के बीच के प्रेम व मित्रता का वर्णन किया गया। साथ ही किस तरह से सुदामा जी पर भगवान वासुदेव ने अपनी कृपा बरसायी उन प्रसंगों से भक्तों को अवगत कराया। कथा के दौरान एक से बढ़कर एक भजनों की प्रस्तुति कर श्रोताओं को आनंद की अनुभूति कराते हुए भक्ति के भवसागर में डुबो दिया। इस मौके पर दर्जनों की संख्या में ग्रामीण श्रद्धालु मौजूद थे। वहीं, दूसरी ओर प्रखंड के पंचर| गांव में कथा वाचक प्रकाश चंद्र झा ने श्रोताओं को अपने प्रवचन के माध्यम से मंत्रमुग्ध किए।

भागवत कथा श्रवण करने से जीवन में आध्यात्मिक और भौतिक उपलब्धि

आचार्य नित्यानंद दास ने बताया कि भागवत के माध्यम से भगवान ध्रुव बाल अवस्था में ही केवल छ:ह महिना में भगवान की प्राप्ति कर अविनाशी पद प्राप्त किये। श्री आचार्य ने कहा कि जो कोई भगवान कथा श्रद्धा व भक्ति से केवल श्रवण करते है उनके जीवन में आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार की उपलब्धि होती है। मनुष्य हमेशा कुछ न कुछ सोचता है। किसी को मानता है और कोई न कोई कर्म करना चाहता है। इसके लिए श्रीमद् भागवत हमें सिख देती है कि मन को कृष्ण भावन भावित रखनी चाहिए। इसे ही दिव्य कर्म भी बतलाया गया है। जिससे मानव जीवन का पूर्ण विकास होता है। समाज में सुख शांति कायम होती है। इसलिए आज के आधुनिक समय में भी देश - विदेश के लोग गीता और भागवत को विश्वविद्यालय में पाठय क्रम में इसको रखे है।

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