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अंग्रेजी हुकूमत के समय दम तोड़ने लगी थी देव भाषा

Bhaskar News Network

Apr 17, 2019, 09:00 AM IST

Motihari News - ओंकारनाथ तिवारी | संग्रामपुर (मोतिहारी) प्राची भारतीय मूल्यों की रक्षा तथा देव भाषा संस्कृत के उत्थान के लिए...

Sangrampur News - english began to lose hope
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ओंकारनाथ तिवारी | संग्रामपुर (मोतिहारी)

प्राची भारतीय मूल्यों की रक्षा तथा देव भाषा संस्कृत के उत्थान के लिए स्थापित ऋषिकुल आज बदहाल है। यहां लगाई गई आयुर्वेदिक जड़ी-बुटियों के पौधे नष्ट हो गए। लेकिन इसकी सुध आज तक किसी ने लेना मुनासिब नहीं समझा।

बताया जाता है कि जब देश में अंग्रेजी राज्य था। तब 1870 के दशक में देवभाषा संस्कृत अपना दम तोड़ने लगी थी। उसी समय हिमालय में घोर तपस्या करने के बाद भारत भ्रमण के दौरान संग्रामपुर गंडक नदी के किनारे पुछरिया में महान संत और संस्कृत के मर्मज्ञ महर्षि योगानंद सरस्वती अवधूत स्वामी का आगमन हुआ था। वे यहां की प्राकृतिक छटा देख गंडक किनारे वास करने के प्रलोभन को रोक नहीं पाए और अपना त्रिशूल वहीं गाड़कर वास करने लगे। सन्त शिरोमणि के ज्ञान और विज्ञान का प्रचार प्रसार शीघ्र ही सभी दिशाओं में फैल गया और अगल बगल के गांव से लोग उनके पास आकर उनसे ज्ञान की बातें सुनने लगे। लोगों की सेवा सत्कार को देख संत वहां बस गए। लेकिन सन्त का मन यह देखकर व्यथित हो उठा था कि यहां के लोग संस्कृत जैसी वाणी से बहुत ही दूर हो चुके थे। शास्त्रों के गूढ़ ज्ञान को फैलाने की नीयत से उन्होंने देवभाषा की रक्षा का बीड़ा उठाया। अपने इस महान संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने ऋषिकुल की स्थापना का निर्णय लिया। हिमालय में तपस्या के दौरान सन्त ने आयुर्वेद का विशद ज्ञान प्राप्त किया हुआ था। जिसे उन्होंने अपने शिष्य को भी इस ज्ञान से सराबोर किया। मठ परिसर में भी हिमालयी जड़ी बूटियां काफी समय तक रहीं। लेकिन अब सामाजिक सहयोग के आभाव में मठ की दशा काफी दयनीय हो चली है और वे बूटियां भी अब अनुपलब्ध हैं।

महर्षि विज्ञानानन्द के दीक्षित शिष्य अज्ञेय मिश्रा ने बताया कि बचपन मे हमलोगों को बाबा अपने गुरु के महान ज्ञान की चर्चा करते थे। बताते थे कि योगानंद बाबा योग के निष्णात विद्वान थे। वे अपने पेट का सभी आंत नदी के जल में जलक्रिया के माध्यम से बाहर निकालकर साफ किया करते थे। साथ ही सर्प दंश का भी उनके पास अमोघ इलाज था।

देव भाषा संस्कृत के उत्थान के लिए संग्रामपुर में 1890 में स्थापित ऋषिकुल आश्रम की स्थिति बदहाल, महर्षि योगानंद सरस्वती ने की थी स्थापना, खोज-खबर लेने वाला नहीं

आश्रम में महर्षि योगानंद की तस्वीर के साथ सन्यासी।

... और फिरंगियों की यहां एक न चली

संग्रामपुर मठ के चौथे मठाधीश श्री 108 श्री स्वामी हरदेवनन्द सरस्वती अवधूत ने उक्त जानकारी देने के क्रम में बताया कि उनके उस महान पूर्वज ने संस्कृत की रक्षा हेतु अपने जैसा ही योग्य शिष्य स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती अवधूत को दीक्षित किया। 1890 में जब देश के महान क्रांतिकारी अंग्रेजों को भगाने के उद्योग में लगे थे, उसी दौरान इस गुरुकुल में सैकड़ों छात्रों को शिक्षा दी जा रही थी। फिरंगियों ने इनकी पढ़ाई में बाधा डालने का पूरा प्रयास किया लेकिन सन्तों के तेज और ज्ञान के सामने उनकी एक न चली।

वर्तमान में मठ और ऋषिकुल दोनों की ही स्थिति दयनीय

जिस सन्त ने समाज की सेवा में अपना पूरा जीवन और ज्ञान लगा दिया आज उन्हीं की कीर्ति ऋषिकुल मठ और ऋषिकुल संस्कृत महाविद्यालय दोनों उपेक्षा का शिकार होकर दिन दशा को प्राप्त हो गए है।मठ के पास अपनी कोई सम्पति भी नहीं है जिससे सन्तों का जीवन यापन हो सके।

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