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सेहत से सौदा; ज्यादा दिहाड़ी के लिए 600 मजदूर 9 घंटे में 104 वैगन क्लिंकर करते हैं खाली

मजदूरों को व्यापारी सामान्य मजदूरों को मिलने वाली 300-400 के बदले 600 रुपए तक दिहाड़ी दे रहे हैं।

Dainik Bhaskar

Mar 13, 2018, 05:13 AM IST
फेस मास्क की कौन कहे, दस्ताने और जूते भी मयस्सर नहीं हैं श्रमिकों को। पैरों पर पॉलीथिन बांध कर करना पड़ता है काम। फेस मास्क की कौन कहे, दस्ताने और जूते भी मयस्सर नहीं हैं श्रमिकों को। पैरों पर पॉलीथिन बांध कर करना पड़ता है काम।

मुजफ्फरपुर. नारायणपुर अनंत स्टेशन स्थित मालगोदाम की लाइन संख्या 20 व 21 पर क्लिंकर लदी मालगाड़ी का रैक दो-दो हिस्से में बीते शुक्रवार को खड़ी थी। हर वैगन के आगे एक-एक ट्रैक्टर। कुल 104 वैगन में रखी क्लिंकर अनलोड करने में करीब 600 मजदूर पसीना बहा रहे थे। लगभग हर खेप के साथ मजदूर ऐसे ही पसीना बहाते हैं। हर बार पसीने से गीले उनके शरीर पर क्लिंकर से उड़ रही धूल की परत इस तरह जम जाती है कि श्रमिक ऐसे दिखने लगते हैं, जैसे वे राख से नहाए हों।

क्लिंकर में मालगाड़ी से अनलोडिंग के वक्त भी इतना ताप रहता है, जिससे इन मजदूरों के पैरों में छाले पड़ जाते हैं। गिनती के कुछेक मजदूरों को छोड़ अधिकतर को अपने पैरों में बोरा बांधना पड़ता है। कई लोग तो पॉलीथिन बांधे भी काम पर लगे हैं। अधिकतर मजदूरों को फेस मास्क नहीं मिला है। मजदूरों के चेहरे पर नाक तक तौलिए बंधे होते हैं। बावजूद इसके घंटे-दो घंटे पर हर मजदूर निढाल हो जा रहा है। चंद मिनटों तक आराम करने के बाद फिर वह क्लिंकर के ढेर पर पहुंच जाता है। क्योंकि, हर हाल इन मजदूरों को महज 9 घंटे के अंदर सभी 104 वैगन क्लिंकर अनलोड कर देनी है। ऐसा नहीं होने पर रेलवे क्लिंकर मंगाने वाले व्यापारियों से लाखों रुपए जुर्माना वसूलेगा। तभी इन मजदूरों को व्यापारी सामान्य मजदूरों को मिलने वाली 300-400 के बदले 600 रुपए तक दिहाड़ी दे रहे हैं।

क्लिंकर के कारण रक्सौल में तबाह हुई थी कई जिंदगी

नेपाल की सीमा से लगते रक्सौल में क्लिंकर की ढुलाई 1998 में शुरू हुई थी। तब से 2004 तक काफी कम मात्रा में क्लिंकर अनलोडिंग-लोडिंग का काम होता था। 2004 से क्लिंकर की रक्सौल से ढुलाई बेतहाशा बढ़ी। उसके साथ ही शुरू हो गया लोगों पर दुष्प्रभाव पड़ा। लोग विभिन्न बीमारियों की चपेट में आने लगे। इस कारोबार से जुड़े लोगों और नेपाल में इस कच्चे माल की मुख्य उपभोक्ता सीमेंट निर्माता कंपनियां लगातार सुरक्षा उपायों की अनदेखी करती रहीं। प्रदूषण नियंत्रण के उपाय पर कभी ध्यान नहीं दिया। उसी तरह की स्थितियां मुजफ्फरपुर में भी हैं।

नतीजा हुआ 80 फीसदी लोग आ गए जहर की चपेट में

क्लिंकर के उड़ते धूलकण के प्रदूषण के कारण शहर के 80 प्रतिशत लोग प्रभावित हुए थे। लगभग एक दर्जन से अधिक लोगों की मृत्यु क्लिंकर के प्रदूषण से हो गई। इनमें क्लिंकर अनलोडिंग-लोडिंग में जुटे मजदूर भी शामिल थे। लेकिन, फिर भी एहतियाती उपाय नहीं किए गए। एक-एक कर मजदूर और आसपास के लोग भी बीमार पड़ते गए।

फिर शुरू हुआ विरोध, चला प्रदर्शन व आंदोलनों का दौर
परेउवा के लोगों ने 2005 में आंदोलन शुरू किया। उस आंदोलन में रेल सुरक्षा बल और स्थानीय लोगों में झड़पें हुईं। झड़प को लेकर रेलवे ने कई लोगों पर मामले दर्ज करवाए। इसके बाद लोग कोर्ट के चक्कर के डर से आंदोलन नहीं कर रहे थे। क्लिंकर की आवक लगातार बढ़ती गई। लोग बीमार पड़ते गए। 24 जून 2016 को रंजीत सिंह अनशन पर बैठे। चार दिन बाद अनशन टूटा।

दिसंबर 2017 में शुरू हुआ निर्णायक आंदोलन
11 दिसंबर 2017 से 25 दिसंबर 2017 तक लगातार आंदोलन चला। इसमें स्वच्छ संस्था रक्सौल के रंजित सिंह, अनिल अग्रवाल, सीमा जागरण मंच के महेश अग्रवाल, ग्राम स्वराज मंच के रमेश कुमार सिंह, संभावना के भरत प्रसाद गुप्ता, जनाधिकार पार्टी के मुस्तजाब आलम, श्री सत्यनारायण मारवाड़ी मंदिर के ट्रस्टी कैलाश चंद्र काबरा और पेंटर पानालाल के नेतृत्व में सैकड़ों लोग डटे रहे।

कोर्ट में याचिका के साथ पीएमओ से लगाई गुहार

सामाजिक कार्यकर्ता स्वयंभू सलभ ने 22 अगस्त 2012 को तत्कालीन रेल मंत्री मुकुल राय को क्लिंकर के धूलकण से निजात के लिए पत्र भेजा। कार्रवाई नहीं हुई। फिर 18 जून 2014 को तत्कालीन रेल मंत्री सदानंद गौड़ा को लिखा गया। 2 जुलाई 2014 को प्रधानमंत्री कार्यालय से शिकायत दी गई। 16 जनवरी 2015 को पीएमओ ने विदेश मंत्रालय को मामला भेज दिया। रेल मंत्रालय को भी कार्रवाई करने को कहा।महेश अग्रवाल ने पटना हाईकोर्ट में जनहित याचिका सीडब्ल्यूजेसी 15338/2016 दायर की।

चिंताजनक थी अस्पताल प्रबंधन की रिपोर्ट
क्लिंकर के धूलकण के प्रभाव पर डंकन अस्पताल के प्रबंधक ने रिपोर्ट जारी की थी। कहा था कि शहर के 80 प्रतिशत लोगों को दमा, साइनस और श्वास संबंधी बीमारियां हैं। यहां तक कहा गया था कि क्लिंकर की डस्ट से फेफड़े का कैंसर भी हो रहा है। 2 जुलाई 2016 और 3 जुलाई 2016 को पीएचसी के चिकित्सकों ने शिविर लगा कर 210 लोगों की जांच की। विभिन्न प्रकार की जांच के बाद 115 लोगों में लंग्स का कैंसर, फेफड़ों से जुड़ी अन्य बीमारियों के साथ टीबी और स्किन डिजीज के भी मामले मिले।

आंदोलनों के बाद जागे थे बेतिया के सांसद
जन आंदोलनों के दबाव में बेतिया के सांसद संजय जयसवाल ने रेलमंत्री से मिल कर क्लिंकर की समस्या का समाधान करने की मांग की। इसके बाद रेल मंत्री ने रक्सौल के लिए बुकिंग बंद करने का निर्देश दिया। अंतत: 22 दिसंबर 2017 से रक्सौल के लिए रेलवे ने क्लिंकर की बुकिंग बंद कर दी। 10 क्लिंकर की रक्सौल यार्ड में अनलोडिंग-लोडिंग नहीं होने से रक्सौल वासी राहत महसूस कर रहे हैं। प्रदूषण में कमी आई है। रक्सौल नगर परिषद के वार्ड नंबर 1, 2, 3, 4 ,5, 6, 7 व 16 के लोग अब खुश हैं।

... और मुजफ्फरपुर के लोगों के माथे पर थोप दी गई बीमारी
रक्सौल के लिए बुकिंग बंद होने के बाद मुजफ्फरपुर के नारायणपुर अनंत रेल यार्ड में क्लिंकर की अनलोडिंग-लोडिंग हो रही है। यहां से उसे ट्रक में लोड कर सड़क के रास्ते नेपाल भेजा जा रहा है। कंपनियां मालामाल हो रही हैं। भले ही लोग बीमार पड़ रहे हों।

लीची व आम की फसल हो रही चौपट

नारायणपुर अनंत से सटे दिघरा रामपुर, मिठनपुरा लाला, शेरपुर, बेला, शेरपुर अनंत, धीरनपट्‌टी और बेला छपरा जैसे ग्रामीण इलाकों में लीची-आम की फसल चौपट होने लगी है। लीची अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक विशाल नाथ ने कहा कि मंजर आने के वक्त धूलकण युक्त प्रदूषण से लीची की फसल को नुकसान हो रहा है। फोटो सिन्थेसिस की क्षमता कम होने और लीची के मंजर पर धूल जम जाने से परागण की क्रिया नहीं हो पा रही है। इससे शहद का कारोबार भी प्रभावित हो रहा है। खास कर इन इलाकों में लीची के पेड़ प्रदूषण के कारण सूख रहे हैं। आम का भी कमोवेश यही हाल है।

मजदूरों के शरीर पर जमी धूल से नाला जाम

मजदूरों के शरीर पर जमी धूल का अंदाजा इसी से लगाया सकते हैं कि हर दिन मालगोदाम का नाला जाम हो जाता है। दरअसल, मजदूरों के नहाने के लिए रेलवे ने वहां नल लगवाए हैं। मजदूरों के शरीर की धूल की मोटी परत पानी के साथ नाले में जमा हो जाती है। साबुन और शैम्पू के पाउच से भी नाला जाम हो जाता है। शुक्रवार की रात नाला जाम होने से रेलवे ट्रैक पर काफी पानी जमा हो गया। कुछ देर इस लाइन से परिचालन भी बाधित रहा। इंजीनियरिंग विभाग ने नाला साफ कराया। फिर मालगाड़ियों का परिचालन शुरू हो सका।

ठेकेदारों को रेलवे के जुर्माने से बचने की चिंता रहती है। मजदूरों पर दबाव रहता है घंटों का काम मिनटों में पूरा करने का। ट्रैक्टर और लोडर मशीनों का भी क्लिंकर अनलोडिंग में इस्तेमाल होता है। ट्रैक्टर चालक मालगोदाम से क्लिंकर लाद कर करीब एक किलोमीटर आगे लीची बागान में ढेर करता है। ट्रैक्टर से अनलोडिंग के दौरान आसपास के इलाके में धुएं का गुबार सा उठता रहता है। अक्सर, मिठनपुरा-दिघरा मार्ग पर धूल की वजह से अंधेरा छा जा जाता है। वहां फिर लोडर मशीनों से ट्रकों पर क्लिंकर लोड की जाती है। ट्रक एनएच-28 से दिघरा, कच्ची-पक्की, रामदयालुनगर, गोबरसही, भगवानपुर, चांदनी चौक से मोतिहारी और रक्सौल होते हुए नेपाल के वीरगंज तक पहुंचता है।

सबके लिए चिंताजनक बातें

- शाही लीची का उत्पादन प्रभावित होगा, आम के पड़ेंगे लाले
- साग-सब्जी और फूलों की खेती भी चौपट हो जाएगी
- स्कूल कॉलेज में पढ़ रहे बच्चों की सेहत पर भी पड़ेगा असर

- भू-जल प्रदूषण होने से पीने का पानी हो सकता है दूषित
- सांस लेने में लगातार बढ़ रही है परेशानी
- लोगों की आंखों में अकसर हो रहा है जलन
- शाम ढलने से पहले बादलों का डेरा व धुंध जैसा अंधेरा हो जाता है

रोज ऐसे ही श्रमिक बन जाते हैं ‘भूतनाथ’। रोज ऐसे ही श्रमिक बन जाते हैं ‘भूतनाथ’।
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नारायणपुर अनंत में मालगाड़ी से क्लिंकर अनलोड करते मजदूर। नारायणपुर अनंत में मालगाड़ी से क्लिंकर अनलोड करते मजदूर।
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