6 माह से झारखंड छोड़ रजौली में बसेरा बनाए हैं कई आदिवासी परिवार, सुधि लेने वाला कोई नहीं

Nawada News - रजौली मुख्यालय में पड़ोसी झारखंड से बड़ी संख्या में आदिवासी अपने पूरे परिवार के साथ रजौली के जंगलों में स्थाई बसेरा...

Dec 04, 2019, 09:06 AM IST
Rajuli News - many tribal families have settled in rajauli leaving jharkhand for 6 months no one takes care of
रजौली मुख्यालय में पड़ोसी झारखंड से बड़ी संख्या में आदिवासी अपने पूरे परिवार के साथ रजौली के जंगलों में स्थाई बसेरा डाल रखे हैं। कहते हैं रोजगार के लिए इधर आए हैं। जनजाति परिवार रजौली थाना क्षेत्र के जंगली व अति नक्सल प्रभावित इलाकों में बस रहे हैं। लेकिन जिला व स्थानीय प्रशासन का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा है। आलम यह है कि दिनों दिन इतनी संख्या बढ़ती जा रही है। पिछले कुछ माह में झारखंड से आने वालों की संख्या में और वृद्धि हुई है। रजौली थाना क्षेत्र के अति नक्सल प्रभावित हरदिया पंचायत की जमुंदाहा से दो किलोमीटर आगे घने जंगल में चेन्नईटांड़ के पास इन लोगों ने अपना आशियाना बनाया है। जहां किसी प्रकार की बुनियादी साधन नहीं है। जो कुछ भी वहां है इन लोगों के द्वारा बनाया गया है। इस स्थान पर दो दर्जन से अधिक परिवार यहां पर निवास कर रहे हैं।

झारखंड के तीन जिलों से आए हैं

आदिवासी परिवार झारखंड राज्य के सरायकेला, खरसावां, खूंटी, मुरहू व तमाड़ के रहने वाले हैं। वे अपना पुश्तैनी घर को छोड़कर नक्सल प्रभावित इलाकों में रोजगार के नाम पर शरण ले रखे हैं। प्राकृतिक संसाधन से भरपूर राज्य झारखंड को छोड़कर बिहार के घने जंगलों में रोजगार के लिए बसना समझ से परे हैं। आदिवासी जिन जगहों को अपना आशियाना बनाया है वहां न तो खेती के लिए जमीन है और नहीं सड़क,पानी बिजली आदि की समुचित व्यवस्था है। दूर-दूर तक रोजगार के साधन भी कहीं नहीं दिखते हैं।

झारखंड के खूंटी व तमाड़ से आए हैं सभी परिवार

जंगली जानवराे से सुरक्षा मे तैनात अदिवासियों की टीम।

विरोधाभासी है बयान

जनजाति परिवारों के बयान विरोधाभासी है। कोई रोजगार के लिए आने की बात कहते हैं तो कोई पूर्व से निवास स्थल पर फैक्ट्री लगाने के कारण जमीन छिन जाने की बात कहते हैं।

सप्ताह के गुरुवार को आपस में करते हैं बैठक

पूरे गांव के लोग सप्ताह में गुरुवार के दिन बैठक करते हैं। प्रत्येक सप्ताह सभी लोग दस रुपए जमा करते हैं। जमा राशि जरूरतमंद आदिवासी परिवार को मदद के रूप में देते हैं। अगर लोगों के पास किसी प्रकार से पैसा नहीं आया तो बैठक में जमा पैसे से लोग अपने घरों के लिए राशन की व्यवस्था करते हैं।

तीर धनुष और पारंपरिक हथियार से करते हैं अपनी रखवाली

सभी आदिवासी परिवार रोजगार के नाम पर घने जंगल में निवास कर रहे हैं। जहां हमेशा जंगली जानवरों का खतरा रहता है। ऐसे में ये लोग दिन और रात अपने घरों की रखवाली पारंपरिक हथियार तीर धनुष से करते हैं। पूछने पर बताया कि कोई जंगली जानवर गांव वालों पर हमला नहीं करें। इसीलिए पहरेदारी करते हैं घर की महिलाएं खजूर के पत्ते का चटाई बुनकर रोजगार का प्रबंध करती है।

रजौली व सिरदला में बसे हैं बड़ी संख्या में आदिवासी

चेन्नईटांड़ के अलावा परतौनिया, चरघरवा, पिछली,पहाड़ी महुलियाटांड़, नावाडीह, चैकाटांड़ परवातरी, नुनुपुर, शेलघर, घुडीटांड़ गोटापीह, थमकोल,मिनियाटांड़, इन सभी जगहों पर झारखंड के आदिवासी ने अपना आशियाना बना लिया है। जनसंख्या लगभग पांच हजार बताई जाती है।

पीने के पानी के लिए हाथों से खोद दिया 30 फीट का कुआं

जंगल में पीने की पानी का समस्या विकराल है, उससे निजात पाने के लिए आदिवासी ने हाथों से 30 फीट का कुआं खोद दिया है। उसके बाद भी भरपूर मात्रा में पानी नहीं मिलता है। पूरी रात कुआं में रिसाव से जमा पानी निकालकर लोग अपनी प्यास बुझाते हैं। वहीं राशन के लिए लोग झारखंड के कोडरमा जाते हैं।

कहते हैं आदिवासी

कुछ-कुछ हिंदी समझने वाले सानिक मुंडा, जुरा मुंडा, मालू मुंडा, एतवार मुंडा आदि बताते हैं कि हमलोग झारखंड से यहां रोजगार के लिए आए हैं। हम लोग झारखंड के जंगली इलाकों में रहते थे। जहां सरकार बड़ी-बड़ी फैक्ट्री लगाना शुरू कर दिया। इस वजह से हम लोग पूरे परिवार के साथ पलायन कर यहां आ गए हैं। अभी हम लोग छह महीना से यहां रह रहे हैं। रोजगार के लिए इधर-उधर जाते हैं और शाम में वापस आ जाते हैं।

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