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जगह-जगह जमा हुआ लकड़ियों का ढेर, आज जलेगी बुराई की प्रतीक होलिका
10 मार्च को होली के रंगोत्सव से पहले आज बुराई की प्रतीक होलिका को जलाया जाएगा। होलिका यानि अगजा जलाने को को लेकर युवाओं में जबरदस्त उत्साह दिख रहा है। युवाओं ने होली जलाने के लिए जगह-जगह लकड़ियों का ढेर जमा किए हैं।
आज रात को शुभ मुहूर्त शाम 6: 26 से 8: 52 तक होलिका दहन किया जाएगा। इसके बाद मंगलवार को होली मनाई जाएगी। बता दें कि रंगों और खुशियों का त्योहार होली मुख्य रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिका दहन किया जाता है। जबकि इसके अगले दिन रंग-गुलाल लगाकर लोग होली मनाते हैं। सोमवार को होलिकादहन होगा जिसे अगजा भी कहते हैं । इसे लेकर जिले में जगह-जगह तैयारियां की गई है। युवाओं ने जलावन की लकड़ियां, पुआल व दूसरी चीजें इकट्ठा की है। नवादा शहर में करीब 6-8 जगहों पर होलिकादहन होता है। मुख्य रूप से शहर के चैक-चैराहों पर होलिका दहन किया जाता है। संध्या में लोग होलिकादहन करते हैं।
होलिका दहन शुभ मुहूर्त
{होलिका दहन की तिथि - 9 मार्च
{होलिका दहन मुहूर्त - शाम 6 बजकर 26 मिनट से रात 8 बजकर 52 मिनट।
{पूर्णिमा तिथि प्रारंभ - 9 मार्च सुबह 3 बजकर 3 मिनट
{पूर्णिमा तिथि समाप्त - 9 मार्च रात 11 बजकर 17 मिनट
होलिका की राख लगाकर होली की शुरुआत
होलिका दहन के दिन बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी में पवित्र अग्नि जलाई जाती है और अग्नि में जौ एवं चने को भूंज कर उसे खाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि उस पवित्र अग्नि में भुने हुए चने और जौ खाने से हमारे अंदर की बुराई और दुर्भाग्य का अंत होता है। हमारे भीतर अच्छे संस्कार का अभ्युदय होता है। होलिका दहन के अगले दिन सुबह में होलिका की राख को लोग सिर में या पूरे शरीर में लगाते हैं।
हिरण्यकशप की बहन थी होलिका
यह पर्व बुराई का प्रतीक रही होलिका को दहन करने के लिए किया जाता है। इसके पीछे अनेक ऐतिहासिक गाथाएं हैं। मान्यता है कि राजा हिरण्यकश्प के बेटे प्रहलाद भगवान भक्त थे। हिरण्यकश्प अपने बेटे से नाराज रहता था। उसे मारेन के लिए हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया था। होलिका के पास एक विशेष प्रकार की चादर थी। होलिका को ऐसा वरदान था कि यदि वह उस चादर को ओढ़कर अगनी में समाहित भी हो जाए तो वह नहीं जलेगी। होलिका ने एक दिन जलावन की ढेर में प्रह्लाद को जलाने की कोशिश की। वह चादर ओढ़कर अग्नि में बैठ गई। तभी हवा के झोंकों से वह चादर उड़ गया, होलिका आग में जल गई और भक्त प्रहलाद प्रभु की कृपा से सुरक्षित बच गए। तब से समाज में होलिकादहन की पंरपरा चली आ रही है।
हाेलिका दहन के लीए जमा की गइ अगजा।