डॉ. बद्रीनाथ वर्मा और डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा का जीवन सदा रहा अनुकरणीय

Nawada News - श्री हिंदी पुस्तकालय सोहसराय में रविवार को साहित्यिक मंडली नालंदा शंखनाद के तत्वावधान में साहित्य के आदर्श...

Bhaskar News Network

Nov 11, 2019, 09:57 AM IST
Roh News - the life of dr badrinath verma and dr sachchidanand sinha has always been exemplary
श्री हिंदी पुस्तकालय सोहसराय में रविवार को साहित्यिक मंडली नालंदा शंखनाद के तत्वावधान में साहित्य के आदर्श पुरुष बदरीनाथ वर्मा की 117वीं और शिक्षाविद डा. सच्चिदानंद सिन्हा की 148वीं जयंती मनाई गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार डॉ. हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी ने की। समारोह में उपस्थित लोगों ने दोनों विभूतियों के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रियदर्शी ने कहा कि महान साहित्यसेवी, पत्रकार, प्राध्यापक, स्वतंत्रता सेनानी और बिहार के प्रथम शिक्षा मंत्री आचार्य बदरीनाथ वर्मा का व्यक्तित्व और चरित्र अनुकरणीय रहा। वे राजनीति में एक सशक्त साहित्यिक हस्तक्षेप थे। शिक्षाविद डा. सच्चिदानंद सिन्हा तो बिहार के जनक ही थे। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपने साहित्यिक और राजनीतिक स्वार्थ में डूबे देश व प्रदेश के कर्णधार तथा नेतागण उन्हें भूलते जा रहे हैं।

इन्होंने भी किया याद

साहित्यकार प्रो. डा. आनंद वर्द्धन, इतिहासकार तुफैल अहमद खां सूरी, कमल प्रकाश, मगही कवि उमेश प्रसाद उमेश, समाजसेवी धीरज कुमार, संजय कुमार पाण्डेय, साधना कुमारी, राजीव कुमार शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

साहित्य के आदर्श पुरुष थे बद्रीनाथ वर्मा व डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा

कार्यक्रम मंे शामिल सहित्यकार।

सम्पूर्ण गीता कंठस्थ थी बद्रीनाथ बाबू को, उनसे सीख लेने की जरूरत

साहित्यिक मंडली शंखनाद के सचिव साहित्य प्रेमी राकेश बिहारी शर्मा ने कहा कि संस्कृत, हिंदी, बांग्ला, उर्दू और अंग्रेजी के ज्ञाता बदरीनाथ वर्मा को सम्पूर्ण ‘’गीता’’ कंठस्थ थी। नि:स्संदेह, जो कोई भी बदरीनाथ वर्मा जी के जीवन-वृत्त का अनुशीलन करेगा, उसे उसमें सरलता, स्वच्छता, सच्चरित्रता, साहस और परम सत्ता के प्रति प्रपन्नता के उदहारण उपलब्ध होंगे। जब महापुरुषों की बातें आती हैं तो हमारा चित्त उनके उन जीवन आदर्शों की ओर उन्मुख हो उठता है। शर्मा ने कहा कि बदरी बाबू पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और महान राजनीति शास्त्री चाणक्य का गहरा प्रभाव था। उन्होंने चाणक्य के जीवन से सीखा था कि राज कोस के धन का निजी कार्य में, एक बूंद तेल के लिए भी व्यय नहीं करना चाहिए।

सच्चिदानंद सिन्हा ने अलग राज्य बनाने की मांग उठाई थी

डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने बिहार को अलग राज्य बनाने की मांग उठाई थी। डा. सिन्हा भारत के प्रसिद्ध सांसद, शिक्षाविद, अधिवक्ता तथा पत्रकार और परिवर्तनकारी राजनेता थे। वे संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष डा. राजेंद्र प्रसाद और डा. सच्चिदानंद सिन्हा संविधान सभा के अंतरिम अध्यक्ष थे। 9 दिसंबर 1946 को वे इसके अध्यक्ष निर्वाचित हुए। डा राजेंद्र प्रसाद ने डा. सिन्हा से ही पदभार ग्रहण किया था। बिहार को बंगाल से पृथक राज्य के रूप में स्थापित करने वाले लोगों में उनका नाम सबसे प्रमुख है।

स्वर्ण अक्षरों में लिखा है बदरी बाबू का नाम

साहित्यकार प्रो. डा. लक्ष्मीकांत सिंह ने कहा कि अंग्रेजी के प्राध्यापक होते हुए भी बदरी बाबू ने हिंदी के लिए जो किया वह स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे ऐसे महापुरुष थे जो अपनी आखिरी सांस तक राष्ट्र और राष्ट्रभाषा के सौभाग्य संवारने के लिए सतत सचेष्ट रहे। उन्होंने कहा कि सच्चिदानंद सिन्हा एक महान शिक्षाविद, पत्रकार, राजनेता और परिवर्तनकारी थे। पटना में सिन्हा पुस्तकालय की स्थापना 1924 में डा. सच्चिदानंद सिन्हा ने की थी। इस पुस्तकालय का मूल नाम ‘’श्रीमती राधिका सिन्हा संस्थान एवं सच्चिदानन्द सिन्हा पुस्तकालय’’ है। साहित्यकार बेनाम गिलानी ने हज़रत मोहम्मद साहब के जीवनकाल पर विस्तार से प्रकाश डाला। आचार्य बदरीनाथ वर्मा में बताते हुए कहा कि वर्मा जी हिन्दी हीं नही, बल्कि उर्दू और अंग्रेजी के भी विद्वान थे। सहित्यकार व गीतकार मुनेश्वर शमन ने कहा कि पत्रकारिता के कीर्ति-स्तम्भ बिहार के प्रथम शिक्षा मंत्री बदरी नाथ वर्मा एक अत्यंत मोहक और अनुकरणीय व्यक्तित्व थे। उन्होंने राज्य के शिक्षा विभाग समेत अन्य विभागों के मंत्री रहते हुए इसका अक्षरश: पालन किया।

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