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परंपरा : मगध में बुजुर्गों के सम्मान के लिए खेली जाती रही है बुढ़वा होली
मणिपुर में तीन दिनों तक अध्यात्मिक होली मनाई जाती है। इसे याओसंग उत्सव मनाते हैं। इसी तरह ब्रज, गोकुल, मथुरा, बरसाने, अवध, मिथिला और मुंबइया होली मनाई जाती है। इसी तरह मगध में बुढ़वा होली मनाई जाती है। यह मुख्य होली के अगले दिन मनाया जाता है। मगध में गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, नवादा, शेखपुरा, नालंदा और जमुई इलाका में बुढ़वा होली का प्रचलन रहा है। खास कि बुढ़वा होली के दिन सरकारी स्तर पर छुटट्ी नही रहती। फिर भी मगध के इलाका में अघोषित तौर पर छुटट्ी जैसी स्थिति रहती है। सरकारी और गैर सरकारी संस्थान बंद रहता है। सड़क, मुहल्ले और गलियों में होली के दिन से भी बड़े तौर पर मनाए जाते हैं। वरीय नागरिक संघ के महासचिव महेंन्द्र प्रसाद सिंह कहते हैं कि यह होली बुजुर्गों के सम्मान की होली भी है। आम तौर पर बुजुर्गों की अनदेखी होती रही है। लेकिन बुढ़वा होली अकेला पर्व है जो बुजुर्गों के नाम से है। इसमें सभी लोग मिजजुलकर बनाते हैं। महिलाएं पुरूष, बुजुर्ग युवा और बच्चे सभी भागीदार होते हैं।
शिवपुराण में भी है बुढ़वा होली का जिक्र
हालांकि बुढ़वा होली की प्रासंगिकता शिव पुराण से भी मेल खाता है। वरिष्ठ साहित्यकार राम रतन प्रसाद सिंह र|ाकर के मुताबिक, आदिकाल में होली के दिन भगवान विष्णु-महालक्ष्मी होली खेल रहे थे। तब नारद मुनि ने इसकी चर्चा भगवान शिव से की थी। भगवान शिव ने अपने प्रमुख गण वीरभद्र को बताया था कि मंगल का दिन हो और अभिजीत नक्षत्र हो, उस दिन वह होली खेलते हैं। विष्णुदेव पांडेय ने कहा कि पंचागों में भी ‘बुढ़वा मंगल’ का जिक्र मिलता है। बदलते समय के साथ लोग मंगल दिन का इंतजार करने के बजाय होली के दूसरे दिन होली खेलने लगे।
बुढ़वा होली का रंग होता है गाढ़ा
देखें तो, मगध में जो लोग पहले दिन की होली नही खेलते, उन्हें बुढ़वा होली के दिन सराबोर होने से कोई नही रोक सकता। मुख्य होली के दिन आम तौर दोपहर के पहले कादो और मिटटी से खेलने की परंपरा रही है। समय की आपाधापी में लोग शाम की होली से जो बच जाते हैं। उन्हें बुढ़वा होली में बचना मुश्किल हो जाता है। बुढ़वा होली के दिन होली गानेवालों (होलवइया) की टोली-जिसे झुमटा कहते हैं- अराध्य स्थलों से निकलकर कस्बे-टोले और मुहल्ले में होली गाते हुए गुजरता है। शुरूआत ढोलक, झाल, करताल, के धुनों के बीच अराध्य देव की सुमिरन (प्रार्थना) से होती हैं।मगध में बुजुर्ग पर केन्द्रित कई गीत गाने भी हैं। भंग का रस होलवइया के उत्साह को दोगुना कर देता है। खास कि बुढ़वा होली के कपड़े भी बुढ़ापे की अवस्था जैसी होती है। होली के दिन रंगों से सरावोर कपड़े ही लोगों के शरीर पर चढ़े होते हैं। रंग का उत्साह पहले दिन से ज्यादा ही गहरा होता है।
बुढ़वा होली
राजा को जब हुई जानकारी तब सबके साथ मिलकर खेले थे होली, तभी से बुढ़वा होली की परंपरा
मगध में बुजुर्गों के सम्मान की होली, मगध के राजा पड़ गए थे बीमार इसलिए लोग नहीं मनाए होली
एकल परिवार के बढ़ रहे चलन से समाज में बुजुर्गाें की अनदेखी बन रही बड़ी समस्या
बुजुर्गों के सम्मान की अनूठी कहानी
मगध में बुढ़वा होली मनाए जाने के पीछे कई कहानी रही है। एक कहानी है कि मगध के एक राजा होली के दिन बीमार पड़ गए थे। वह जनप्रिय थे। लिहाजा, जनता भी होली नही मनाई थी। अगले दिन राजा को जब पता चला तब जनता के साथ होली खेेले थे। लोग बताते हैं कि तभी से लोग होली के अगले दिन भी होली खेलने लगे। यह बुढ़वा होली कहलाया जाने लगा। धीरे धीरे यह व्यापक स्वरूप ले लिया।
बुढवा हाेली फाइल फोटो।