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बजट सत्र के 10 दिन... वही 3 विधायक हर रोज एक ही जगह खड़े हुए, बदलते रहे पोस्टर के मुद्दे

एक वर्ष पहले
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बिहार विधानमंडल के बजट सत्र के 10 दिन... एक पार्टी के 3 विधायक हर रोज सदन के बाहर एक ही जगह खड़े हुए। उनके पोस्टर बदलते रहे। मुद्दे बदलते रहे। अधिकांश मसलों पर सदन के भीतर चर्चा नहीं हुई। बजट सत्र में ‘चूहा प्रकरण’, भी आया। यह सब बताता है कि इस बार चुनावी मुकाबले का मोर्चा, कितना गलाकाट व भयावह होगा; जहां शब्द बिल्कुल मर्यादा खो देंगे और जीत की ख्वाहिश, निहायत व्यक्तिगत- घरेलू हमले से परहेज रखने के सामान्य लोकाचार को भी शायद ही मानने देगी।

सोलहवीं विधानसभा के इस आखिरी बजट सत्र के दस दिनों में दिख गया कि नेताओं की टोली कितनी अधिक चार्ज है? कैसे कोई भी, थोड़ा भी मानने या बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है? सवाल का जवाब, सवाल से दिया जा रहा है। चुनाव का एजेंडा भी लगभग साफ है-’राजद का 15 साल बनाम राजग का 15 साल।’ सदन इसी लाइन पर चल रहा है। सवाल-जवाब, आरोप- प्रत्यारोप, विरोध-समर्थन, हंगामा- नारेबाजी ..., सबकुछ इसी लाइन पर। बहुत मायनों में सदन चुनाव प्रचार का प्लेटफॉर्म बन गया है। पार्टियां, एक-दूसरे का गुण-दोष, पब्लिक को खूब बता रहीं। अपने को पब्लिक का बड़ा हितैषी साबित करने में दूसरों की बखिया कुछ ज्यादा उधेड़ी जा रही है। राजद समझाने में लगा है कि अब उसके 15 साल की चर्चा और मुनासिब नहीं, राजग को भी 15 साल हो गए।

सेट हो रहा चुनावी एजेंडा

विपक्ष, वैसी हर जमात से सरोकार जता रहा है, जो सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। दारोगा नियुक्ति को ले विपक्ष ने दो दिन प्रदर्शन किया। मुद्दों को सार्थक मुकाम देने की यह होड़, चुनाव प्रचार के दौरान चरम पर होगी। विधानसभा से दो बड़े मसलों पर सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित हुए। एनआरसी तथा एनपीआर का नया प्रारूप बिहार में लागू नहीं होने देने और जातीय जनगणना कराने का प्रस्ताव। इसका श्रेय लेने की भी होड़ में जीतेगा कौन? सदन, 24 फरवरी से शुरू हुआ। तब से एक भी दिन ऐसा नहीं है, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष टकराया न हो। एनआरसी, एनपीआर, सीएए के मसले पर तो हाथापाई की नौबत भी आई।

हर दिन एक नया मसला


सदन में हर रोज नया मुद्दा उठाने की कोशिश हुई....रोजगार, डीजल अनुदान, भ्रष्टाचार, अपराध, शिक्षा, बुनियादी नागरिक सुविधाएं, पटना जलजमाव, अतिक्रमण हटाओ के क्रम में उजड़े गरीबों से लेकर कोरोना वायरस तक के मसलों पर पार्टियां आमने-सामने रही हैं, रहेंगी। मुद्दों की छीना-झपटी की होड़ भी दिखी। नियोजित शिक्षकों की तादाद बहुत बड़ी है। इसी हिसाब से विपक्ष ने उनकी हड़ताल को बड़ा मुद्दा बनाया, तो सत्ता पक्ष की से कहा गया कि हमने ही इन शिक्षकों का वेतन बढ़ाया है, आगे भी बढ़ाएंगे। सत्ता पक्ष इन शिक्षकों को यह भी बता रहा है कि राजद तो उनको अयोग्य शिक्षक मानता रहा है।


27 फरवरी

25 फरवरी

सदन के बाहर भाकपा-माले के 3 विधायक रोज 3 पोस्टर के साथ खड़े हुए

5 मार्च

3 मार्च

4 मार्च

2 मार्च

26 फरवरी
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