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नक्सलियों के डर से रहने गए थे पहाड़ पर, अब प्रशासन ने भी छीना आशियाना

संयुक्त रूप से कार्रवाई कर पहाड़ पर बसे सौ लोगों की झोपड़ियां तोड़ डाली और उन्हें वहां से बेदखल कर दिया।

Bhaskar News | Last Modified - Dec 30, 2017, 02:47 AM IST

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    जमुई.आदिवासी समुदाय के 118 परिवारों ने नक्सलियों की दहशत के कारण को 14 जुलाई को गांव छोड़ दिया था। इसके बाद वे पत्नेश्वर पहाड़ पर आकर बसे थे। इन परिवारों को शुक्रवार को दोबारा बेघर होना पड़ा। जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन व वन प्रशासन ने संयुक्त रूप से कार्रवाई कर पहाड़ पर बसे सौ लोगों की झोपड़ियां तोड़ डाली और उन्हें वहां से बेदखल कर दिया। हालांकि इसकी संभावना दैनिक भास्कर ने पहले ही जता दी थी।


    नक्सलियों का भय इन्हें आज भी सता रहा है, इस कारण वे लोग घनी आबादी वाले इलाके में ही रहना चाह रहे हैं। इस बाबत वन प्रमंडल पदाधिकारी प्रभाकर झा ने बताया कि एक सप्ताह पहले ही इन लोगों को जगह खाली करने का नोटिस दिया गया था। मजबूरन पुलिस प्रशासन के सहयोग से पहाड़ पर अवैध अतिक्रमण को हटाया गया।


    दहशत से गांव लौटने को तैयार नहीं है लोग


    कुमरतरी व गुरमाहा के लोग वापस गांव लौटने को तैयार नहीं हैं। गांव की महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ विस्थापित की तरह ही जिंदगी जीना चाह रहे हैं। गांव की बड़की हेम्ब्रम, बचिया देवी कहती हैं कि जब नक्सली शिवा और बजरंगी जैसे दो छोटे बच्चों को मार सकते हैं तो वे अपने बच्चों को गंवाना नहीं चाहते हैं और किसी भी हाल में वे गांव नहीं लौटेंगे।

    प्रशासन कर रहा बसाने का प्रयास


    जमुई के डीएम डॉक्टर कौशल किशोर ने बताया कि कुमरतरी व गुरमाहा गांव के लोगों को बसाने के लिए प्रशासन की ओर से प्रयास किया जा रहा है। बरहट में सरकारी जमीन न होने से प्राइवेट लैंड खरीद कर उन्हें बसाने का प्रयास किया गया। लेकिन भू स्वामी द्वारा जमीन की ऊंची कीमत बताए जाने से खरीदारी नहीं हो सकी। प्रयास जारी है, शीघ्र ही उनकी समस्याओं का हल ढूंढ लिया जाएगा। वैसे गैरकानूनी तरीके से आवास बना कर रहने के मामले में कार्रवाई हुई है।

    ग्रामीणों को कई बार समझाया था
    वन प्रमंडल डीएफओ प्रभाकर झा ने बताया कि वन विभाग की जमीन पर इन दो गांवों के लोगों ने अवैध तरीके से झोंपड़ी बना ली थी। पत्नेश्वर पहाड़ जमुई वन क्षेत्र में आता है। ग्रामीणों को कई बार समझाया गया, नोटिस भी भेजा गया, बावजूद वे वहां से हटने को तैयार नहीं थे। गैर कानूनी तरीके से काम करने वालों पर एक समान कार्रवाई होती है।

    नक्सली और पुलिस की कार्रवाई में नहीं कोई अंतर

    प्रशासन की इस कार्रवाई के विरोध में वृद्ध रामदेव कोड़ा अपनी किस्मत को कोस रहे थे। जंगल को छोड़ अपनी बनैली संस्कृति से जुड़ाव को लेकर इन्होंने पत्नेश्वर पहाड़ पर घास-फूस की झोंपडी बनाई थी, जिसे प्रशासन ने तोड़ डाला। नक्सलियों ने कुमरतरी गांव की मीना देवी और उनके दो पुत्र शिवा और बजरंगी की हत्या कर दी थी। खुद को असुरक्षित महसूस करने के बाद लोगों ने पत्नेश्वर पहाड़ पर आकर शरण ले ली, जिसे प्रशासन ने खाली करा लिया। गुरमाहा के जितेंद्र राणा, कुमरतरी के सुखदेव कोड़ा, महेंद्र राय आदि ने कहा कि नक्सली व पुलिस दोनों एक जैसा व्यवहार कर रहे हैं।

    इतना ठंडा में बबुआ के लेके कहां जाएं हजूर...

    प्रशासन व वन विभाग की संयुक्त कार्रवाई में आदिवासियों के 50 से अधिक घर तोड़े जाने के बाद पतनेश्वर पहाड़ के पास मनसरिया देवी अपने छोटे बच्चे को गोद में लिए रो-रोकर कभी वनकर्मी तो कभी मलयपुर पुलिस के पैरों में गिरकर गुहार लगा रही थी। इतना ठंडा में इतना छोटका बबुआ के लेके कहा जाएं हजूर, यहीं पर रहे दोहे न...वहां नक्सली सब के मार देते। किसी भी अधिकारी पर इसका कोई असर नहीं हुआ और इन लोगों ने आदिवासियों के 50 से अधिक घरों को बुरी तरह तोड़फोड़ दिया। इसमें खाने-पीने के अलावा जरूरी सामान भी नष्ट हो गए। इस बाबत सहायक वनरक्षक नरेश प्रसाद ने बताया कि हमलोगों को अधिकारी से एक आदेश पत्र मिला है, जिसमें पतनेश्वर पहाड़ के पास की जमीन से अतिक्रमण हटाने को लिखा है।

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