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सीएम नीतीश ने उठाया सवाल- क्यों घट रही अपराधियों को सजा देने की संख्या?

‘लॉ एंड आर्डर’ की समस्या कहीं न हो, इसके लिए हम कोई भी कदम उठाने को तैयार हैं।

Danik Bhaskar | Dec 18, 2017, 04:38 AM IST

पटना. नीतीश कुमार ने अपराधियों को सजा दिलवाने के मामले में कमी आने पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि हमारी पहली प्राथमिकता कानून का राज स्थापित करना है। ‘लॉ एंड आर्डर’ की समस्या कहीं न हो, इसके लिए हम कोई भी कदम उठाने को तैयार हैं। लोगों के मन में भय के भाव की जगह विश्वास का भाव हो। समय पर ट्रायल हो, अपराधियों को सजा मिले। यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए। हर हाल में कानून का राज रहेगा। यह हमारा संकल्प है। इसके लिए हम हर संभव मदद दे रहे हैं।


उन्होंने कहा- मुख्य न्यायाधीश और मुख्यमंत्री के स्तर पर समय-समय पर बैठक होती है। कानून के राज में कोई दिक्कत नहीं हो, इस पर चर्चा होती है। कानून का राज स्थापित हुआ है तो इसमें सबसे बड़ी भूमिका जूडिशियरी की है। सीएम रविवार को अभियोजन निदेशालय व बिहार न्यायिक अकादमी की ओर से आयोजित वर्कशॉप को संबोधित कर रहे थे। वर्कशॉप ‘इफेक्टिव इंवेस्टिेगेशन, स्पीडी ट्रायल एंड टाइम्ली जस्टिस’ पर फोकस था।

2006 में यह संख्या 6839 थी जो 2016 में 5508 रह गई

सीएम ने कहा कि अपराधियों को सजा दिलाने की संख्या वर्ष 2006 में 6839 थी जो वर्ष 2010 में 14111 तक पहुंच गई लेकिन फिर इसमें गिरावट होने लगी है। वर्ष 2016 में यह संख्या 5508 थी। वर्ष 2006 में इतनी तकनीक भी नहीं थी, फिर भी अच्छा काम हुआ। अब तो और बेहतर काम हो सकता है।

पीपी कोर्ट में ठीक से नहीं रख रहे बात

नीतीश ने कहा कि पीपी कोर्ट में अपनी बात ठीक से नहीं रख रहे। या तो उनकी तैयारी नहीं होती या फिर उनके मन में कुछ दाएं-बाएं रहता है। जो जानकारी मिली है उससे, बात ठीक से नहीं रखने के कारण समस्याएं आती हैं। कोर्ट के सामने तर्क से बात रखिए तो परिणाम सही निकलेगा। आपकी जिम्मेवारी है ठीक ढंग से अपनी बात रखना। निर्णय कोर्ट को करना है। डीएम को भी इसकी मॉनिटरिंग करनी चाहिए कि सरकारी वकील सही समय पर अपनी बातें रखें। हमलोगों ने बिहार में प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट बनाया। स्पेशल कोर्ट एक्ट बना, जो भी लोक सेवक भ्रष्ट तरीके से धन अर्जित करेंगे उनकी संपत्ति जब्त होगी।

12 वर्षों में काफी बदलाव आया पर अब धीमा पड़ रहा अभियान

मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने 12 वर्षों में लंबा रास्ता तय किया है। उस समय बिहार की जो स्थिति थी, सबको मालूम है। समय सीमा पर ट्रायल नहीं होता था, अपराधी छूट जाते थे, कानून का डर नहीं रहता था। थाने में एफआईआर के लिए कागज तक नहीं था। कुछ ही थानों में गाड़ियां थीं और जो थी वो भी खटारा। थ्री नॉट थ्री से एके 47 वाले अपराधियों का सामना कर रहे थे। पर, कितना काम किया गया। हमने जल्द से जल्द मुकदमों के ट्रायल पर जोर दिया। सारी चीजें बदल गई। लेकिन कहीं न कहीं अब हमारा अभियान धीमा पड़ गया है। वर्ष 2007 में बिहार पुलिस एक्ट बना।

लॉ एंड ऑर्डर और इन्वेस्टिगेशन का अलग-अलग विंग होना चाहिए, इसके लिए अलग-अलग एसआई को जिम्मा दे दिया गया। एसपी ट्रांसफर करते समय भी इसका ध्यान रखें। एसपी की ज्यूडिशियल एकेडमी में ट्रेनिंग होनी चाहिए। अनुसंधान से जुड़े एसआई के लिए भी विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।