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पति को नहीं मिल रहा था कर्ज, फिर पत्नी ने मशरुम की खेती कर दिलाया रिक्शा

कविता ने समूह से लोन लेकर घर पर किराने की दुकान खोल ली। जिससे महीनें में बचत और भी बढ गई।

Danik Bhaskar | Jan 01, 2018, 06:41 AM IST
मशरूम की खेती के साथ अपने घर से किराना दुकान चला रही कविता देवी। मशरूम की खेती के साथ अपने घर से किराना दुकान चला रही कविता देवी।

किशनगंज (बिहार). पति के पास रिक्शा खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। किसी से कर्ज भी नहीं मिला। इसी घटना ने पत्नी कविता देवी को स्वावलंबी बना दिया। वो स्वयं सहायता समूह से जुड़ी और मशरुम का उत्पादन शुरु किया। उन्होंने अपने पति को ई-रिक्शा भी खरीदकर दिया है।

2014 में हुई थी ये 'घटना'

कविता बताती हैं कि साल 2014 में उनके पति को रिक्शा खरीदने के लिए कही से भी कर्ज नहीं मिल रहा था। इसके बाद उन्हें जीविका स्वंय सहायता समूह के बारे में पता चला। फिर उन्होंने ग्रुप के मेंबर्स से मुलाकात कर उसमें शामिल हो गईं। उन्होंने कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी। इन्होंने मेला जीविका महिला ग्राम संगठन बनाया। दो साल बाद वो इस संगठन की सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुन ली गईं। इन्होंने अपने गांव के 96 महिलाओं को समूह में जोड़ा और उन्हें समूह का महत्व समझाया। मशरुम उत्पादन की ट्रेनिंग ली। इसके बाद समूह से ही दो हजार रुपया लोन लिया। मशरुम की खेती हुई एवं लोन वापस करने के बाद सात हजार रुपए का मुनाफा भी हुआ। यह मुनाफा धीरे-धीरे बढ़ता चला गया।

अब ऐसी है कविता की आर्थिक स्थिति

आज कविता खुद तो अपने पैरों पर खड़ी है ही साथ ही महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाने में लगी हुई हैं। अब कविता घर का आय बढ़ाने में सफल हुई है और अब अन्य महिलाओं को स्वावलंबी बनाने में जुट गई हैं। गांव की महिलाएं इनसे स्वावलंबन के गुर सीखती हैं।

किराना दुकान भी खोली

कविता ने समूह से लोन लेकर घर पर किराने की दुकान खोल ली। जिससे महीनें में बचत और भी बढ गई। जिसके बाद इन्होंने बकरी उत्पादन भी शुरू कर दिया। समूह आज सफल है और कई अन्य महिलाएं भी इनके दिशा-निर्देश पर मशरुम का उत्पादन और बकरी पालन कर रही है।