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पांच साल बाद कपल फिर हुए एक, बच्चों को मिला मां-पिता का साया

बीबी मेहरूनिशां से मो. हकरू का निकाह 26 सितंबर 2003 को हुआ था। 2012 में दोनों पारिवारिक कलह को लेकर अलग हो गए।

Danik Bhaskar | Dec 10, 2017, 07:13 AM IST

भागलपुर. लोक अदालत की पहल पर शनिवार को पांच साल बाद दंपति फिर एक हुए और उनके बच्चों को मां-पिता का साया भी मिला। इन दो बिछड़े परिवारों के मिलन का गवाह बना राष्ट्रीय लोक अदालत का बेंच संख्या-एक। बेंच संख्या एक के पीठासीन जज एडीजे-5 दीपांकर पांडेय और सदस्य अधिवक्ता आेमप्रकाश तिवारी के समक्ष लोदीपुर की बीबी मेहरूनिशां और मो. हकरू फिर से साथ रहने को राजी हो गए। पुरानी गलतियां न दोहराने की कसमें भी खायीं और घरवालों की रजामंदी लेने से तौबा भी किया।


2003 में हुआ था निकाह, 2012 में दोनों हुए थे अलग


बीबी मेहरूनिशां से मो. हकरू का निकाह 26 सितंबर 2003 को हुआ था। 2012 में दोनों पारिवारिक कलह को लेकर अलग हो गए। इन नौ साल में इनलोगों की तीन बेटियां भी हुई। महर, साजिया व साजदा। दो बेटियां क्रमश: 13 वर्षीय महर व 10 वर्षीय साजिया पिता के साथ रहती है जबकि 8 वर्षीय साजदा मां के साथ। बार-बार बेटियों को जन्म देने पर मेहरूनिशां को हकरू के घरवाले ताने देने लगे। घरवालों को बेटा चाहिए था। वे लोग हकरू की दूसरी शादी कराने को अडिग थे। 9 अप्रैल 2009 को मेहरूनिशां की मां बीबी गुलशन उससे मिलने आयी तो उसे खटपट का पता लगा और वह मेहरूनिशां को लेकर इस्लामपुर बरहपुरा आ गई।

बच्चों की परवरिश में हिस्सा, दो पिता संग व एक मां के साथ


कुछ दिन बाद मो. हकरू जब रूखसत (विदाई) को ससुराल गया तो उसे वापस कर दिया गया। उसे बच्चों से भी मिलने नहीं दिया गया और बीबी मेहरूनिशां को घर में कैद कर दिया गया। ससुराल वालों के इस बर्ताव को लेकर वह घरवालों के साथ ससुराल पहुंचकर अपनी दो बेटियाें को लोदीपुर ले आया। हकरू ने 30 दिसंबर 2012 को फैमिली कोर्ट में पत्नी के खिलाफ मामला दर्ज कर दिया। दरअसल, हकरू तलाक लेने की कानूनी तैयारी कर रहा था। इसकी भनक जब मेहरूनिशां को मिली तो वह भी जिद पर अड़ गई कि किसी सूरत में तलाक नहीं देंगे और हकरू को कोर्ट-कचहरी दौड़ाते-दौड़ाते रहेंगे। हकरू बेचारा पांच साल से कोर्ट दौड़ता रहा। हर तारीख पर अर्जी भी
लगाता रहा।

दोनों को मिलाने की फैमिली जज ने की थी पहल


इसी दौरान एक बार फैमिली जज ने मेहरूनिशां से बुलाकर पूछा कि वह क्या करना चाहती है? बच्चे बड़े होते जा रहे हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई, शादी-विवाह कौन व कैसे करेेगा? इस सवाल ने मेहरू को हिला दिया आैर उसने पति संग रहने पर रजामंदी दे दी। उधर, फैमिली जज ने मो. हकरू से भी बुलाकर पूछा कि वह क्या निदान चाहता है? पत्नी से मोहब्बत नहीं है तो दो बेटियां क्यों साथ रखे हो? तीसरी बेटी व बीबी को साथ रखोगे तो खुश रहोगे? पुरानी खटपट भूलकर फिर से साथ हो जाओ? इसी में दोनों की भलाई है। हकरू को यह बात समझ में आ गई और उसने भी केस उठाने की रजामंदी दे दी।


आदेश मिला तो कोर्ट में ही दंपति रो पड़े


दोनों की मौखिक रजामंदी पर शनिवार को लोक अदालत में पीठासीन जज ने दोनों से रजामंदी की लिखित सहमति दी और जज के सामने ही दोनों गले मिलकर रो पड़े। बाद में तालियाें की गड़गड़ाहट से दोनों के एक होने का इस्तकबाल किया गया। फिर फैमिली कोर्ट के पेशकार रंजीत कुमार ने दोनों को कोर्ट का आदेश थमाया। उसके बाद दोनाें हाथ में हाथ डाले रिक्शा पर सवार होकर लोदीपुर पहुंचा। जहां बच्चे मां-पिता का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।

भागलपुर में 806 मामले निबटे


शनिवार को जिले के तीनों सिविल कोर्ट परिसर में राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया गया। जिसमें भागलपुर में 806 मामले निष्पादित किए गए और 5.04 करोड़ रुपये का समझौता किया गया। नवगछिया में 669 मामले के निष्पादन में 2.90 करोड़ रुपये का समझौता किया गया। जबकि कहलगांव में 284 मामले में 7.12 करोड़ रुपये का समझौता किया गया। जिला विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव पीसी वर्मा ने बताया कि लोक अदालत में बैंक रिकवरी केस के 717, क्रिमिनल कंपाउंडेबुल के 31, एमएसीटी के 24, बिजली विवाद के 25, श्रम विवाद के 9, वैवाहिक विवाद के 1 व अन्य के 4 मामले का निष्पादन किया गया। दिनभर खचाखच भीड़ की कार्रवाई को स्वयं जिला जज अरविंद माधव ने निरीक्षण किया और उचित निर्देश भी दिए।