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यहां दुल्हन की तरह सजाया शौचालय, लिखा- कान खोलकर सुन लो बहना

गांव के एक शिक्षक से कर्ज लेकर शौचालय बनवाने वाली आशा का शौचालय अब मॉडल शौचालय के रूप में प्रचलित हो गया है।

Bhaskar News | Last Modified - Feb 13, 2018, 05:35 AM IST

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    गांव समाज को स्वच्छ व स्वस्थ रखने में गरीबी कभी आड़े नहीं आ सकती।

    डेहरी (बिहार). गांव समाज को स्वच्छ व स्वस्थ रखने में गरीबी कभी आड़े नहीं आ सकती। यहां के मजदूर शंकर सिंह की पत्नी आशा दीदी ने अपने जुनून के जरिए यही साबित किया है। उनके दोनों बच्चे मानसिक विकलांग हैं, फिर भी हौसले रुके नहीं हैं। सुजानपुर की पगली दीदी के नाम से फेमस आशा को जब एक ओडीएफ कार्य में लगे प्रेरक से स्वच्छता का मतलब समझ में आया तो वह भी ठान ली। गांव समाज को स्वस्थ व स्वच्छ रखने का ऐसा बीड़ा उठाया कि फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

    दूसरे पड़ोसी गांव को भी अभियान से जोड़ा

    इस कार्यक्रम से स्थानीय प्रेरकों ने उनकी समझ को परखा और काम पर लगा दिया। वे सुबह-शाम गांव की निगरानी करने लगी और टीम लीडर बन गई। अपने गांव के साथ ही दूसरे पड़ोसी गांव को भी खुले में शौच मुक्त बनाने के अभियान से जुड़ गयी।

    जिलाधिकारी ने किया पुरस्कृत

    रात का अंधेरा हो या दिन का उजाला। हर वक्त स्वच्छता के प्रति सजग है आशा। हाथ में टॉर्च, गले में सीटी टांगे, किसी अंग्रेज की तरह टोपी पहनकर कड़क अंदाज में बाहर शौच करने वालों को रोकना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनकी बात सबके समझ में आने लगी और उन्होंने गांव को खुले में शौच मुक्त करा कर ही दम लिया। अब ओडीएफ की आइकॉन बन गई हैं। उनके समर्पण और काम को देखते हुए अधिकारियों कर्मियों की अनुशंसा पर जिलाधिकारी ने भी पुरस्कृत किया है।

    कर्ज लेकर बनवाया शौचालय

    गांव के एक शिक्षक से कर्ज लेकर शौचालय बनवाने वाली आशा का शौचालय अब मॉडल शौचालय के रूप में प्रचलित हो गया है। खुले में शौच मुक्त कराने के अभियान में मॉडल बनीं आशा का शौचालय अब इलाके के लोगों का रोल मॉडल हो चला है। अपने पति से बिना बताए कर्ज लिया और शौचालय बनवाया था। हालांकि बाद में पैसे की बात उन्होंने पति को बता दिया और कर्ज भी चुकता कर दिया है। शौचालय पर करीब तीस हजार रुपए उन्होंने खर्च किए हैं। सामाजिक कुप्रथा के विरुद्ध उनके अभियान की चर्चा होने लगी है।

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    मजदूर शंकर सिंह की पत्नी आशा दीदी ने अपने जुनून के जरिए यही साबित किया है। उनके दोनों बच्चे मानसिक विकलांग हैं, फिर भी हौसले रुके नहीं हैं।
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    आशा को जब एक ओडीएफ कार्य में लगे प्रेरक से स्वच्छता का मतलब समझ में आया तो वह भी ठान ली। गांव समाज को स्वस्थ व स्वच्छ रखने का ऐसा बीड़ा उठाया कि फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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    इस कार्यक्रम से स्थानीय प्रेरकों ने उनकी समझ को परखा और काम पर लगा दिया।
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    सुबह-शाम गांव की निगरानी करने लगी और टीम लीडर बन गई। अपने गांव के साथ ही दूसरे पड़ोसी गांव को भी खुले में शौच मुक्त बनाने के अभियान से जुड़ गयी।
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    गांव के एक शिक्षक से कर्ज लेकर शौचालय बनवाने वाली आशा का शौचालय अब मॉडल शौचालय के रूप में प्रचलित हो गया है।
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    शौच मुक्त कराने के अभियान में मॉडल बनीं आशा का शौचालय अब इलाके के लोगों का रोल मॉडल हो चला है।
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