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बंजर जमीन देख नौकरी छोड़ी; 3 साल बाद 2 हजार लोगों के लिए बन गए हैं आंत्रप्रेन्योर

जवाहर लाल साह की पहल का ही नतीजा है कि सरैया प्रखंड के भटौलिया गांव में पूरी तरह जैविक विधि से खेती हो रही है।

Bhaskar News | Last Modified - Dec 04, 2017, 07:08 AM IST

  • बंजर जमीन देख नौकरी छोड़ी; 3 साल बाद 2 हजार लोगों के लिए बन गए हैं आंत्रप्रेन्योर

    मुजफ्फरपुर.तीन साल पहले एक निजी संस्थान की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर जैविक खेती की शुरुआत करने वाले जवाहर लाल साह आज 2 हजार लोगों के लिए एंटरप्रेन्योर बन चुके हैं। बंजर हो रही जमीन व अपने क्षेत्र से मजदूरों के पलायन को देख इन्होंने जैविक इंटीग्रेटेड फार्मिंग के क्षेत्र में कदम रखा। फिर आगे बढ़ते चले गए। जैविक खेती के क्षेत्र में रोजगार का सृजन किया और पंजाब-हरियाणा जाकर काम करने वाले करीब 300 लोगों को घर में रोजगार दिया।

    यही नहीं, महुआ को-ऑपरेटिव सोसाइटी के जरिये 1500 किसानों को जोड़कर उन्हें जैविक खेती की जानकारी देने के साथ ही जैविक सामाग्री उपलब्ध करा रहे हैं। अपने तीन वर्ष के प्रयास में ही अब जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए मुजफ्फरपुर ही नहीं राज्य के सभी जिलों के किसानों को वर्मी कंपोस्ट उपलब्ध करा रहे हैं।

    महज 8 एकड़ जमीन से की थी इंटीग्रेटेड फार्मिंग की शुरुआत


    जवाहर लाल साह की पहल का ही नतीजा है कि सरैया प्रखंड के भटौलिया गांव में पूरी तरह जैविक विधि से खेती हो रही है। इन्होंने 2014 में भटौलिया में मात्र 8 एकड़ जमीन में इंटीग्रेटेड फार्मिंग शुरू की थी। इसके लिए गोबर की आवश्यकता को देखते हुए गोपालन कर महुआ डेयरी स्थापित की। इस क्षेत्र में हो रहे कार्यों व आधुनिक विधि जानने के लिए इन्होंने पंजाब व हरियाणा के साथ आईसीएआर दिल्ली से आइडिया लिया।

    वर्मी कंपोस्ट बनाने से पहले गोबर से तैयार किया जाता है बायो गैस


    आधुनिक तरीके से तैयार इस डेयरी में पाले गए 250 गाय के गोबर से वर्मी कंपोस्ट तैयार करने से पहले उसका बायो गैस तैयार होता है। छह माह की जगह केवल 30 से 45 दिन में ही वर्मी कंपोस्ट तैयार हो जाता है। प्रति वर्ष 3 लाख टन वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन कर रहे हैं। यहां उत्पादित वर्मी कंपोस्ट की सप्लाई दरभंगा, मधुबनी, झंझारपुर, समस्तीपुर, कटिहार, पूर्णिया, बक्सर, बिहारशरीफ व नवादा समेत राज्य के विभिन्न जिलों में की जाती है। मुजफ्फरपुर जिले में भी दो हजार से अधिक किसानों को उपलब्ध कराया जा रहा है। गायों को सालों भर हरा चारा देने के लिए नेपियर व बरसीम की खेती यहां होती है।

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