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'इम'प्रैक्टिकल : नहीं देखा लैब का मुंह, लिखी कॉपी 10 रुपए में खरीद दे दिया एग्जाम

छात्रों से जब पूछा गया तो अधिकांश ने अपनी काॅपी में बनाए गए प्रैक्टिकल के बारे में कुछ भी नहीं बताया।

संदीप कुमार | Last Modified - Feb 02, 2018, 03:58 AM IST

  • 'इम'प्रैक्टिकल : नहीं देखा लैब का मुंह, लिखी कॉपी 10 रुपए में खरीद दे दिया एग्जाम

    बेगूसराय.10 रुपए में खरीदते हैं काॅपी, कभी लैब का मुंह ही नहीं देखे हैं तो कैसे बताऊं लैब में कैसे होता है प्रकाश का परावर्तन या फिर कैसे बनता है सीओटू। ये जवाब उन छात्रों के हैं, जिन्होंने मैट्रिक की प्रैक्टिकल परीक्षा दी है। प्रैक्टिकल परीक्षा कितनी प्रैक्टिकल यह जानने की कोशिश जब दैनिक भास्कर के संवाददाता ने की तो कई चौंकाने वाला सच सामने आया।

    मैट्रिक के प्रैक्टिकल परीक्षा में काॅपी जमा करते हुए छात्रों से जब पूछा गया तो अधिकांश ने अपनी काॅपी में बनाए गए प्रैक्टिकल के बारे में कुछ भी नहीं बताया। हालांकि कुछ ने जवाब जरूर दिया, लेकिन उन्हें भी लैब टेस्ट के बारे में कुछ भी नहीं पता था। दर असल ये छात्र स्कूल के चपरासी या अन्य किसी फोर ग्रेड कर्मी को पैसा देकर पुरानी छात्रों की जमा कॉपी को खरीद लेते हैं। फिर नई कॉपी में वैसा ही चित्र बनाकर अपनी नई कॉपी तैयार कर लेते हैं।

    मालूम हो कि बेगूसराय जिले में 22 जनवरी से 31 जनवरी तक प्रैक्टिकल परीक्षा ली गई और एक फरवरी तक सभी विद्यालयों में प्रैक्टिकल की रिपोर्ट विभाग को भेज दी है। मालूम हो कि भले ही बच्चों को लैब में प्रैक्टिकल करने आता हो या नहीं, लेकिन अधिकांश विद्यालय में मैट्रिक का होम सेंटर होने के कारण अधिक से अधिक नम्बर दिए जाते हैं।


    भास्कर के रिपोर्टर से छात्रों कहा- सर क्यूं बच्चे को फंसा रहे हैं


    प्रकाश का प्रवर्तन कैसे होता है। जेके स्कूल में समूह में काॅपी जमा करने आए छात्रों से पूछा गया तो छात्रों ने कहा कि सर क्यूं बच्चे को फंसा रहे हैं। अगर इतना आता तो लैब में कर के नहीं बता देता। सर आजतक यही परंपरा रही है। जब स्कूल में लैब है ही नहीं तो हमलोगों को कैसे लैब टेस्ट करने आएगा। नाम छापने पर सर नम्बर भी कम आएगा। हमलोग काॅपी जमा करते हैं और इसी आधार पर नम्बर दिया जाता है।

    हू-ब-हू चित्र बना देते हैं

    शहर के पांच उच्च विद्यालयों में प्रायोगिक परीक्षा का आयोजन किया गया था, जिसमें से चार स्कूलों का दैनिक भास्कर संवाददाता ने जायजा लिया।

    लैब में हम कुछ नहीं जानते

    प्रैक्टिकल जमा करने आये छात्र-छात्राओं से जब हमने पूछा कि प्रेक्टिकल में क्या जानते हैं आपलोग इसपर छात्रों ने बताया कि जब हमलोग लैब देखे ही नहीं हैं तो लैब में प्रैक्टिकल कैसे करें। इसलिए जो भी सवाल हमने काॅपी में लिखे हैं उसे तो हमलोग बिना देखे पुरानी काॅपी से हूबहू नकल कर बना दिए हैं। हमने जो कॉपी जमा किया है उस विधि को हम लैब में नहीं बना पाएंगे।

    बड़ा सवाल: विद्यालयों में प्रयोगशाला है ही नहीं तो कैसे सीखेंगे बच्चे

    मालूम हो कि जिले में कुल 186 विद्यालय हैं। जिसमें पुराने हाई स्कूलों की संख्या 84 है, जबकि 102 मध्य विद्यालय को उत्क्रमित कर हाई स्कूल बनाया गया है। लेकिन इसमें से कुछ के पास लैब की सामाग्री तो है, लेकिन भवन नहींं है। लेकिन अधिकांश विद्यालय में लैब ही नहीं है। इसके कारण दसवीं पास करने के बाद जब बच्चे इंटर में जाते हैं तो उसे लैब का उपकरण भी नही पहचान पाते हैं। जेके +2 विद्यालय की प्राचार्या पुष्पा कुमारी ने बताया कि हमारे विद्यालय में लैब की सामग्री है, टीचर भी हैं, लेकिन प्रयोगशाला रूम नहीं है। इसके बाद भी हमलोग अपने स्तर से बच्चों के बोर्ड पर चित्र बनाकर परखनली और माइक्रोस्कोप समेत अन्य उपकरण की जानकारी देते हैं बच्चों को काॅपी लिखना भी बताते हैं। लेकिन आज जरूरत है समय के साथ स्कूल में भी परिवर्तन लाया जाए।

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