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चारा घोटाला सामने लाने वाले अफसर ने सुनाई कहानी, कहा- 6 पेज में लिखी थी रिपोर्ट

वीएस दुबे ने गड़बड़ी की जांच अपने स्तर से की थी और पूरी रिपोर्ट खुद ही तैयार भी की।

​आलोक चन्द्र | Last Modified - Jan 07, 2018, 04:46 AM IST

  • चारा घोटाला सामने लाने वाले अफसर ने सुनाई कहानी, कहा- 6 पेज में लिखी थी रिपोर्ट
    वीएस दुबे उस समय बिहार के वित्त सचिव थे। बाद में वे बिहार और झारखंड के मुख्य सचिव भी हुए। (फाइल फोटो)

    पटना.तब पशुपालन विभाग की वित्तीय अनियमितता से संबंधित फाइल लेने से तत्कालीन चीफ सेक्रेटरी ने स्पष्ट इनकार कर दिया था। मैं तो हतप्रभ था। इसमें पशुपालन विभाग में जारी अनियमितता की पूरी रिपोर्ट मैंने छह पन्नों में लिखी थी। आज यह फाइल सीबीआई के पास है और घोटाले की पूरी जानकारी का आधार है। वीएस दुबे ने गड़बड़ी की जांच अपने स्तर से की थी और पूरी रिपोर्ट खुद ही तैयार भी की।


    वित्त विभाग के तत्कालीन सचिव वीएस दुबे ने घोटाले से संबंधित पूरी जानकारी साझा करते हुए बताया कि मामला बेहद संवेदनशील था, इसीलिए खुद ही फाइल लेकर मुख्य सचिव के पास गया था। उन्होंने 6 बजे जाने का हवाला देकर फाइल लेने से इनकार कर दिया। मैंने उनसे कहा कि वे फाइल घर लेकर जाएं और इसका अध्ययन करें, गंभीर मामला है। उन्होंने मना कर दिया। मैंने कहा कि बाढ़ आ जाए या कोई आपदा आ जाए तो क्या छह बजे की बात चल सकती है। उन्होंने कहा- पशुपालन विभाग को बदनाम करने की कोशिश हो रही है। वे फाइल लेने को जब तैयार नहीं हुए तो मैंने उनकी टेबल पर फाइल रख दी और वहां से चला आया। उन्हें यह भी कह दिया कि फाइल की एक फोटोकॉपी मेरे पास मौजूद है। जरूरत पड़ी तो इसे केंद्र या फिर सीबीआई को भेज सकता हूं। बाद में इस मुद्दे पर अपने कनीय विजय राघवन और शंकर प्रसाद से बात भी की।


    उस समय यह गड़बड़ी 1150-1200 करोड़ की थी। आज के संदर्भ में इसे देखा जाए तो यह घोटाला 1.20 से 1.30 लाख करोड़ का होगा। यह उस समय देश का सबसे बड़ा घोटाला था। पशुपालन विभाग में 70 के दशक से ही ऐसी गड़बड़ियां होने लगी थीं। तब घोटाला लाखों में था, 10-15 लाख की गड़बड़ी।

    1995 में जल संसाधन विभाग से वित्त में किया गया था ट्रांस्फर


    वीएस दुबे ने कहा- मैं तो 1995 में जल संसाधन विभाग में सचिव था। विभाग की माली हालत खस्ता थी। तटबंध-नहर की मरम्मत के लिए भी पैसे नहीं थे। पर, इसी में कुछ-कुछ कर रहा था। विभाग के मंत्री जगदानंद थे, जो बेहद काबिल और ईमानदार थे। उन्होंने मेरे काम से प्रसन्न होकर मुझे वित्त विभाग संभालने को कहा। मैंने यह कहते हुए कि मुझे वित्त की कोई जानकारी नहीं, स्पष्ट रूप से मना कर दिया। लेकिन उन्होंने संभवत: मुख्यमंत्री लालू प्रसाद से बात की और मुझे 27 जुलाई, 1995 को वित्त विभाग का प्रभार मिल गया। मैंने देखा कि ट्रेजरी में पैसा ही नहीं था। कर्मचारियों को वेतन देने का भी पैसा नहीं था। मेरे साथ अपर वित्त आयुक्त विजय राघवन और शंकर प्रसाद थे। हमने बैठकर प्रदेश की माली हालत पर विस्तार से चर्चा की। सबसे पहली संकट तो वेतन देने का था। हम केंद्र के पास गए और केंद्रीय करों में अपनी हिस्सेदारी की अगस्त की राशि बड़े अनुनय-विनय के बाद जुलाई में प्राप्त की। तब यह राशि 315 करोड़ थी, जबकि वेतन पर 250-300 करोड़ खर्च होता था। पहली संकट दूर होने के बाद हमने आगे सोचना शुरू किया। हमने विभागीय समीक्षा शुरू की। तीन साल का रिव्यू किया तो स्पष्ट हो गया कि 60 करोड़ की जगह 120 करोड़ तो 90 करोड़ की जगह 150 करोड़ का खर्च था।

    पशुपालन विभाग में एक माह में ही खर्च हुए थे 30 करोड़ रुपए

    हमने पशुपालन विभाग पर नजर रखना शुरू किया। विभागीय स्टेटमेंट मंगवाया। 19 जनवरी 1996 को स्टेटमेंट मिला, जिसे रात के 8 बजे देखा। इसमें देखा कि विभाग ने सितंबर में ही अपने 92 करोड़ के बजट की जगह 126 करोड़ खर्च कर दिया था। अगस्त तक 92 करोड़ के अंदर ही खर्च था। एक माह में 30 करोड़ खर्च कर दिया गया था। इसके बाद सभी डीसी-डीएम को फैक्स भेजकर जिलों में जांच का निर्देश दिया- पशुपालन विभाग के अंतर्गत आपके जिला में जो खर्च हुआ है, उसका विवरण शीर्षवार लौटती फैक्स से भेजें। पर, इसमें सुस्ती हो सकती थी। अपने स्तर से जांच शुरू की। विभाग के बजट पदाधिकारी ने बताया कि चर्चा है कि रांची-चाईबासा में भारी गड़बड़ी है। पटना से फूल सिंह को वहां भेजा, उन्हें रिक्शे पर ही लोगों ने घेर लिया। उन्होंने फोन पर डरते हुए यह जानकारी दी तो मैंने तत्काल वहां के कमर्शियल टैक्स के संयुक्त सचिव शिवेंदू को उनके पास भेजा।

    जांच के बाद लगभग 300 वाउचर देखा गया, जो पूरी तरह फर्जी थे। दो बोरा में फर्जी वाउचर पटना मंगवाया। इसके बाद मैंने विस्तृत रिपोर्ट बनाकर मुख्य सचिव एके बसाक को सौंपी। इसमें मैंने पशुपालन विभाग में वेतन छोड़कर सारी निकासी रोकने, अधिकारियों को जिलों से हटाने, ट्रेजरी पर रेड करने की अनुशंसा की थी। मैंने रांची के डीसी राजीव कुमार और चाईबासा के डीसी अमित खरे को रेड करने को कहा। खरे ने 27 जनवरी 1996 को रेड किया तो करोड़ों का बोगस वाउचर पकड़ा गया। खरे ने तब कहा कि सर, यह तो तिलस्म का दरवाजा है। लालू यादव ने रात एक बजे फोन किया और भोजपुरी में कहा- हंगामा कर देहल..., तहलका मचा देहल...। हालांकि बाद में उनके निर्देश पर ही एफआईआर भी हुआ। उसके बाद जांच कमेटी बनी, लेकिन मुझे नहीं रखा गया। पर, कमेटी के सदस्य राघवन के अनुरोध पर मैं भी प्रधान सचिव के नाते जांच में शामिल हुआ। 28-29 जनवरी 1996 को रांची और जमशेदपुर में जांच के बाद मैं लौट गया।

    घोटाले का खुलासा तो 19 जनवरी को ही हो गया था

    चारा घोटाले का खुलासा 19 जनवरी को ही हो चुका था, जब मैंने मान सिंह को ट्रेजरी जांच के लिए भेजा और वहां भारी गड़बड़ पकड़ी गई। इसके बाद मैंने नोट तैयार कर मुख्य सचिव को 22 जनवरी को फाइल सौंपी। लगभग 1150 करोड़ की गड़बड़ी की गई थी। यदि उसी समय मेरे उठाए सवाल पर कार्रवाई हुई होती तो काफी कुछ पहले ही पकड़ा जाता। बहुत पैसा रिकवर होता और सारे लोग पकड़े जाते। पर, जांच में हील-हुज्जत के कारण मामला 27 जनवरी तक पहुंच गया। इस दौरान बड़ी मात्रा में सबूत नष्ट कर दिए गए। मामला तो सामने आ ही चुका था और घोटाला करने वाले सक्रिय हो चुके थे। अमित खरे को भी मैंने कार्रवाई के लिए समझाया और उनका अधिकार याद करवाया। बाद में 27 जनवरी को छापा पड़ा तो फिर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। फिर तो एक के बाद एक तार जुड़ते चले गए।

    मुझे नहीं पता कि इसमें लालू यादव इन्वॉल्व थे, आज भी नहीं जानता

    चारा घोटाले में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद जो वित्तमंत्री भी थे, की संलिप्तता के बारे में नहीं जानता था। इसीलिए जब मुख्य सचिव ने नाराजगी दिखाई और कहा कि यह पशुपालन विभाग और लालू प्रसाद को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है तो मैंने अनभिज्ञता प्रकट की थी। सच कहूं तो न उस समय और न आज मैं यह कह सकता हूं कि इसमें लालू प्रसाद की संलिप्तता है। पर, विभाग में भारी गड़बड़ी हुई और ट्रेजरी की लूट हुई, इसका प्रमाण है।

    (वीएस दुबे उस समय बिहार के वित्त सचिव थे। बाद में वे बिहार और झारखंड के मुख्य सचिव भी हुए।)

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Web Title: Story About Fodder Scam By Finance Secretary VS Dubey
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