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भास्कर में छपी खबरों से बौखलाए वीसी ने भेजा लीगल नोटिस, पूछा पक्ष तो कहा, हां-कमियां हैं

19 फरवरी से एक मार्च के बीच छपी आठ खबरों पर आपत्ति करते हुए कुलपति की तरफ से भास्कर को लीगल नोटिस भेजा गया।

Bhaskar News | Last Modified - Mar 13, 2018, 06:20 AM IST

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    भागलपुर.दैनिक भास्कर ने फरवरी में विश्वविद्यालय की कई खबरें छापीं। इनमें से 19 फरवरी से एक मार्च के बीच छपी आठ खबरों पर आपत्ति करते हुए कुलपति की तरफ से भास्कर को लीगल नोटिस भेजा गया। सोमवार को कुलपति द्वारा बुलाए गए प्रेस कांफ्रेंस में जब उनसे इन खबरों और इस पर की गई आपत्ति पर सवाल किए गए तो कुलपति वही तथ्य दोहराने लगे जिनके आधार पर दैनिक भास्कर ने ये खबरे छापी थीं।


    पहले राजभवन के आदेश का मखौल उड़ाया अब विभागीय जांच कराने में जुटा विश्वविद्यालय


    21 फरवरी को दैनिक भास्कर में इस हेडिंग से खबर छपी थी जिसमें बताया गया था कि परीक्षा नियंत्रक अरुण कुमार सिंह पर फेल छात्रों को पास कराने के लगे आरोप के तहत जब उन्हें सस्पेंड किया गया। उन्होंने सस्पेंशन को राजभवन में चुनौती दी थी तो विवि ने न्यायिक जांच शुरू कराई थी। राजभवन ने न्यायिक जांच को गलत कहा था और इसकी विभागीय जांच कराने को कहा था।


    लेकिन विवि ने विभागीय जांच कराने में डेढ़ महीने की देरी कर दी और न्यायिक जांच रिपोर्ट की प्रतीक्षा करता रहा। विश्वविद्यालय ने इस पर आपत्ति जताई थी। अब इस मामले में कुलपति ने कहा है कि राजभवन ने कहा था कि विभागीय जांच भी करा सकते थे। न्यायिक जांच रिपोर्ट की प्रतीक्षा इसलिए करते रहे कि जिन्हें यह जिम्मा दिया गया था वह रिस्पांस नहीं ले रहे थे। कई बार फोन किया गया, ई-मेल किया गया। लेकिन जवाब नहीं मिला। अब विभागीय जांच हो रही है।

    टीएमबीयू में डीएसडब्ल्यू और प्रॉक्टर की नियुक्ति में नियमों का हुआ उल्लंघन

    यह खबर 25 फरवरी को प्रकाशित हुई थी। इसमें बताया गया था कि गेस्ट फैकल्टी की बहाली विवि ने यह कहकर रोक दी कि राजभवन ने मुंगेर विवि के बनने तक तबादले और पोस्टिंग पर रोक लगा दी है तो इसी दौरान डीएसडब्ल्यू और प्रॉक्टर की नियुक्ति कैसे हो गई। विवि ने इस खबर पर भी आपत्ति जताई थी। 13 फरवरी को राजभवन में हुई बैठक में तबादले और पोस्टिंग पर रोक का निर्णय लिया गया था। अब कुलपति का कहना है कि तबादला और पोस्टिंग पर रोक की अधिसूचना राजभवन से विवि को 27 फरवरी को मिली जबकि अधिकारियों का फेरबदल 13 फरवरी को हो गया था। कुलपति सहित प्रॉक्टर डॉ. विलक्षण रविदास ने कहा कि राजभवन में बैठकें होती रहती हैं। जब अधिसूचना मिलती है तब उस पर अमल किया जाता है।

    सिंडिकेट का निर्देश बेअसर, लॉ कॉलेज के प्राचार्य के वित्तीय अधिकार पर रोक नहीं

    यह खबर 27 फरवरी को छपी थी। इसमें बताया गया था कि लॉ कॉलेज की मान्यता के नाम पर छात्रों से पैसे लेने सहित कुछ दूसरी वित्तीय अनियमितताआें का हवाला देकर सिंडिकेट ने 16 जनवरी को हुई बैठक में कहा था कि मामले का ऑडिट होने तक प्राचार्य के वित्तीय अधिकार पर रोक लगा दी जाए। जब फरवरी के पहले हफ्ते में सिंडिकेट की अगली बैठक हुई तो यह मुद्दा एजेंडे में नहीं था। इसके बाद 20 फरवरी को रजिस्ट्रार डॉ. एसएन चौधरी ने बयान दिया था कि वित्तीय अधिकार पर रोक का अादेश दे दिया गया है। लेकिन 14 फरवरी को विवि ने प्राचार्य को पत्र जारी करते हुए केवल ऑडिट कराने को कहा था। अब कुलपति का कहना है कि सिंडिकेट की जिस बैठक में वित्तीय अधिकार पर रोक लगाने का निर्णय हुआ था उसमें यह मामला उन्हें पूरी तरह याद नहीं था। एजेंडा भी अचानक से लाया गया। बाद में उन्होंने मामले की जांच रिपोर्ट पढ़ी तो पाया कि जांच कमेटी ने छात्रों से वसूले गए पैसे सामंजित करने की अनुशंसा करते हुए वित्तीय अनियमितता के आरोप से प्राचार्य को मुक्त कर दिया था। इसीलिए केवल ऑडिट कराने को कहा गया।

    सीनेट हॉल में लगी आठ हजार की कुर्सी बैठते ही टूट गई


    28 फरवरी को छपी इस खबर पर भी विवि ने आपत्ति की थी। खबर में बताया गया था कि कैसे एक कुर्सी पहली बार बैठते ही टूट गई। खबर में यह भी कहा गया कि 216 कुर्सियों में एक कुर्सी का टूटना बड़ी बात नहीं है लेकिन इसके पीछे कुर्सियाें की खरीद की कहानी में गड़बड़ी की बू आ रही है। प्रतिकुलपति, एफए से लेकर डीओ तक को पता नहीं कि कुर्सियां खरीदी कैसे गईं। अब कुलपति ने कहा है कि इन कुर्सियों की खरीद की प्रक्रिया पूर्व के कुलपति के समय से चल रही थी। जब भी सीनेट हॉल में कोई कार्यक्रम होता था तो भाड़े पर कुर्सियां आती थीं जो उन्हें खराब लगता था। उन्होंने एजेंसी को 12 जुलाई तक कुर्सी देने को कहा था। देरी हुई तो 14 अगस्त तक डिलीवरी करने को कहा। फिर देरी हुई तो उन्होंने ऑर्डर कैंसिल कर दूसरी एजेंसी से कुर्सी लेने का निर्णय किया। लेकिन एफए के अनुरोध पर पहली वाली एजेंसी को ही ऑर्डर दे दिया। लेकिन अब वह मामले की जांच और गुणवत्ता की पड़ताल कराएंगे तभी भुगतान करेंगे। अभी तक उनके पास भुगतान की फाइल आई नहीं है।


    टीएमबीयू में काम करने वाली कंप्यूटर एजेंसियों से जुड़ते रहे हैं नेताओं के नाम


    रिजल्ट तैयार करने के लिए कंप्यूटर एजेंसी को ठेका देने से जुड़ी इस खबर में एनएसयूआई ने ठेका देने में नेताओं से सांठगांठ का आरोप लगाया था। इसी खबर में बाइट शॉपी को फिर से ठेका देने पर सवाल उठाया गया था क्योंकि इस एजेंसी पर 14 फेल छात्रों को पास करने का आरोप था और डीन की कमेटी ने इसे काली सूची में डालने को कहा था। विवि ने इस खबर पर भी आपत्ति की थी। अब वीसी का कहना है कि बाइट शॉपी को वित्त कमेटी की बैठक में एफए के कहने पर ठेका दिया गया। ठेका देने के लिए जो टेंडर जारी किया गया था उसमें तकनीकी गड़बड़ी के कारण देरी हो रही थी। दोबारा टेंडर करने पर प्रक्रिया में देरी होती और इससे रिजल्ट का काम रुकता। इसीलिए बाइट शॉपी को काम देना पड़ा।

    वीसी का आरोप

    विभिन्न पार्टियों से जुड़े छात्रनेता अपने निजी स्वार्थ की वजह से विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करते हैं। दैनिक भास्कर में बिना तथ्यों की पड़ताल के खबरें छपती हैं। भास्कर के रिपोर्टर पत्रकारिता के सिद्धांतों के खिलाफ काम कर रहे हैं। कुछ तत्व जिनके स्वार्थों की पूर्ति नहीं हो पाती है उनके प्रभाव में रिपोर्टर विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ खबरें लिखते हैं।

    भास्कर का जवाब

    दैनिक भास्कर निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता में यकीन रखता है। हम खबरों के साथ किसी स्तर पर कोई समझौता नहीं करते। बिना तथ्यों की पड़ताल किये हम खबरें नहीं छापते। इसीलिये कुलपति के लीगल नोटिस के बाद भास्कर ने उनकी हर आपत्ति पर उनसे बात की। भास्कर की खबरें सच साबित हुईं। खुद कुलपति ने माना-सिस्टम में कमियां तो हैं। हमारे पास कुलपति की बातचीत की रिकार्डिंग उपलब्ध है।

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    भास्कर को भेजे लीगल नोटिस में लगाए गंभीर आरोप।
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    नलिनिकांत झा।
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