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7.59 करोड़ लगने के बाद भी 5 साल में नहीं बना पुल, अब यूथ्स ने अपनाया ये रास्ता

मुख्यमंत्री से गुहार लगाई है कि पुल का निर्माण कार्य जल्द पूरा करवाने के लिए वह खुद हस्तक्षेप करें।

Dainik Bhaskar

Jan 08, 2018, 07:55 AM IST
श्रमदान करते गांव के लड़के। श्रमदान करते गांव के लड़के।

मुजफ्फरपुर. इस कड़ाके की ठंड में भी गायघाट प्रखंड में शबसा चौक और लदौर के लोगों को एक-दूसरे इलाके में आने-जाने के लिए बाढ़ जैसी स्थिति से सामना करना पड़ रहा है। वजह यह कि दोनों क्षेत्र के बीच रजुआ घाट पर करीब पांच वर्षों के बाद भी पुल नहीं बन सका।

वैसे इस पुल के निर्माण के लिए 2013 में ही सरकार ने 7.59 करोड़ रुपए स्वीकृत कर दी थी। उसी साल 23 फरवरी को गायघाट की तत्कालीन विधायक ने पुल निर्माण कार्य का शिलान्यास किया। निर्माण शुरू भी हुआ। लेकिन, आधे निर्माण के बाद काम अटक गया। इसकी वजह फंड की कमी बताई गई। तब से अब तक परेशानी झेल रहे इस गांव के युवाओं ने वैकल्पिक मार्ग बनाने का जिम्मा अपने कंधों पर लिया। रविवार को रास्ता बनाने का काम शुरू कर दिया। इस बीच तत्कालीन विधायक वीणा देवी ने भी पुल बनवाने को दोबारा पहल की है।

उल्लेखनीय है कि इस अर्ध निर्मित पुल के कारण गायघाट प्रखंड की चार पंचायतों के 20 गांवों और 50 हजार से अधिक की आबादी को लाभ होगा। साथ ही दूसरे क्षेत्रों से आने-जाने वालों को भी सहूलियत होगी। बीते साल की बाढ़ के कारण इस पूरे इलाके में पानी भरा हुआ था। अब भी पानी जमा है, लेकिन कम। रविवार को लदौर गांव के युवाओं ने पानी के बीच से ही रोड बनाना शुरू कर दिया। ग्रामीण दिनेश चंद्र मिश्र ने कहा कि इस वैकल्पिक मार्ग से आसपास की चार पंचायतों लदौर, हरपुर, मोरो और रसलपुर के साथ 20 गांव के लोगों को लाभ मिलेगा।

वीणा देवी ने सीएमओ से किया निर्माण का आग्रह

इधर, तत्कालीन विधायक वीणा देवी ने मुख्यमंत्री कार्यालय को आधे-अधूरे निर्माण की तस्वीर के साथ 2013 में लगाए शिलान्यास पट्ट की तस्वीर भेजी है। उन्होंने मुख्यमंत्री से गुहार लगाई है कि पुल का निर्माण कार्य जल्द पूरा करवाने के लिए वह खुद हस्तक्षेप करें।

आंदोलन की पीड़ा से मिला सबक


ग्रामीणों का कहना है कि दो साल पहले इस पुल के निर्माण के साथ ही बिजली समस्या दूर करने को लेकर लदौर और शबसा चौक के लोगों ने एनएच 57 को जाम किया था। समस्या दूर नहीं हुई, पर झंझट जरूर बढ़ गया। उस समय दोनों गांवों के 27 लोगों को नामजद कर प्रशासन ने प्राथमिकी करा दी। सभी कचहरी का चक्कर लगा रहे हैं। राजन ने कहा कि ऐसे में युवाओं की टोली ने खुद रास्ता बनाने की पहल की। केवटसा में हाई स्कूल और सिमरी में कॉलेज होने के कारण छात्रों को करीब 12 किलोमीटर घूम कर आना-जाना पड़ रहा है।

दूसरा रास्ता यहीं पानी से होकर गुजरता है। इसी रास्ते को बनाया जा रहा है। चंदन कुमार ने कहा कि सरकार को इस गांव की सुध नहीं है। वैसे आंदोलन की पीड़ा के बावजूद 26 जनवरी से आसपास की पंचायतों के लोग इस पुल के निर्माण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाने तक अनशन पर बैठेंगे। वैकल्पिक रास्ता बनाने वाली टोली में गोपाल, आशीष कुमार, संतोष, मन्नू कुमार, प्रेम झा, गोविंद कुमार, पंकज झा, हरिओम मंडल, चंदेश्वर राय और राजू पासवान जैसे युवा शामिल हैं।

लोगों को एक-दूसरे इलाके में आने-जाने के लिए बाढ़ जैसी स्थिति से सामना करना पड़ रहा है। लोगों को एक-दूसरे इलाके में आने-जाने के लिए बाढ़ जैसी स्थिति से सामना करना पड़ रहा है।
दोनों क्षेत्र के बीच रजुआ घाट पर करीब पांच वर्षों के बाद भी पुल नहीं बन सका। दोनों क्षेत्र के बीच रजुआ घाट पर करीब पांच वर्षों के बाद भी पुल नहीं बन सका।
इस पुल के निर्माण के लिए 2013 में ही सरकार ने 7.59 करोड़ रुपए स्वीकृत कर दी थी। इस पुल के निर्माण के लिए 2013 में ही सरकार ने 7.59 करोड़ रुपए स्वीकृत कर दी थी।
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श्रमदान करते गांव के लड़के।श्रमदान करते गांव के लड़के।
लोगों को एक-दूसरे इलाके में आने-जाने के लिए बाढ़ जैसी स्थिति से सामना करना पड़ रहा है।लोगों को एक-दूसरे इलाके में आने-जाने के लिए बाढ़ जैसी स्थिति से सामना करना पड़ रहा है।
दोनों क्षेत्र के बीच रजुआ घाट पर करीब पांच वर्षों के बाद भी पुल नहीं बन सका।दोनों क्षेत्र के बीच रजुआ घाट पर करीब पांच वर्षों के बाद भी पुल नहीं बन सका।
इस पुल के निर्माण के लिए 2013 में ही सरकार ने 7.59 करोड़ रुपए स्वीकृत कर दी थी।इस पुल के निर्माण के लिए 2013 में ही सरकार ने 7.59 करोड़ रुपए स्वीकृत कर दी थी।
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